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आज का इतिहास:26 साल पहले देश में पहली बार मोबाइल फोन पर बात हुई, तब बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने संचार मंत्री सुखराम से की थी बात

6 महीने पहले
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आज से ठीक 26 साल पहले 31 जुलाई 1995 को भारत में मोबाइल फोन से पहली बार दो लोगों ने बात की थी। कोलकाता की रॉयटर बिल्डिंग से ये फोन लगाया गया था। मोबाइल से कॉल लगाने वाले थे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु।

बसु ने तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम को फोन किया था। सुखराम उस वक्त दिल्ली के संचार भवन में बैठे थे। इस फोन कॉल से भारत में संचार क्रांति की शुरुआत हुई। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टेलिकॉम मार्केट है।

देश में मोबाइल टेक्नोलॉजी पर काम 1980 में शुरू हुआ। जब बीके मोदी ने मोदी कॉर्प नाम से एक कंपनी की स्थापना की। ये कंपनी टेलिकॉम, फाइनेंस, एंटरटेनमेंट और टेक्नोलॉजी से जुड़ा कामकाज देखती थी। यही कंपनी आगे चलकर स्पाइस ग्लोबल बनी।

1993 में मोदी कॉर्प ने ऑस्ट्रेलियाई कंपनी टेलस्ट्रा के साथ पार्टनरशिप कर मोदी टेलस्ट्रा कंपनी बनाई। 1993 में मोदी टेलस्ट्रा भारत में सेलुलर सर्विस लॉन्च करने वाली पहली कंपनी बनी थी। 1994 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने बीके मोदी से मिलकर इच्छा जताई कि कलकत्ता मोबाइल नेटवर्क वाला देश का पहला शहर बने।

90 के दशक में नोकिया इस तरह के कीपैड फोन बनाने वाली दुनिया की सबसे प्रसिद्ध कंपनी थी।
90 के दशक में नोकिया इस तरह के कीपैड फोन बनाने वाली दुनिया की सबसे प्रसिद्ध कंपनी थी।

उस समय एक समस्या ये थी कि भारत में अभी भी मोबाइल ऑपरेटिंग टेक्नोलॉजी नहीं थी। बसु की इस इच्छा को पूरी करने बीके मोदी अपनी पार्टनर कंपनी टेलस्ट्रा से मदद मांगने ऑस्ट्रेलिया गए। वहां नोकिया कंपनी से बीके मोदी की बातचीत हुई और नोकिया टेक्नोलॉजी देने के लिए तैयार हो गया।

नोकिया उस समय टेलिकॉम टेक्नोलॉजी की एक अग्रणी कंपनी थी। नोकिया और टेल्स्ट्रा ने मिलकर एक साल में ही कलकत्ता में मोबाइल नेटवर्क का काम पूरा कर लिया। 31 जुलाई 1995 को इस नेटवर्क के जरिए पहली कॉल की गई।

हालांकि देश में मोबाइल सेवा को आम लोगों तक पहुंचने में समय लगा। इसकी वजह थी महंगे कॉल रेट। शुरुआत में एक आउटगोइंग कॉल के लिए 16.80 रुपए प्रति मिनट और कॉल सुनने के लिए 8.40 रुपए प्रति मिनट देना होता था या एक कॉल पर कुल 24 से 25 रुपए प्रति मिनट का खर्च आता था।

1940: ब्रिटेन जाकर जलियांवाला बाग का बदला लेने वाले उधम सिंह शहीद हुए

अप्रैल 1919 में अंग्रेजों ने कांग्रेस के नेता सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया था। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को हजारों लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग पहुंचे। लोगों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी था, तभी जनरल डायर अपनी सेना के साथ वहां आ धमका। डायर ने बाग को घेर लिया और बिना किसी पूर्व चेतावनी के लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

पार्क में आने-जाने के लिए एक ही गेट था, अंग्रेजों ने उसे भी बंद कर दिया। बचने के लिए लोग दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करने लगे, लेकिन नाकाम रहे। कई लोग अंग्रेज सैनिकों की गोली से बचने के लिए बाग के कुएं में कूद गए। इस नरसंहार में हजारों मासूम लोग मारे गए।

इस पूरे हत्याकांड का गवाह एक युवा भारतीय था। उसने जनरल डायर की करतूतें देखीं थीं। इस युवा ने इस नरसंहार का बदला लेने की कसम खाई। फैसला लिया कि वो भारतीय लोगों का नरसंहार करने वाले जनरल डायर को मौत के घाट उतारेगा। इस युवा का नाम था- उधम सिंह।

अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए उधम सिंह कई देशों से होते हुए लंदन पहुंचे। हालांकि तब तक जनरल डायर मर गया था। अब उधम सिंह ने अपना ध्यान माइकल ओ' ड्वायर की हत्या पर लगाया। माइकल ओ' ड्वायर जलियांवाला बाग नरसंहार के समय पंजाब का गवर्नर था। उसने भारतीयों के इस नरसंहार को सही बताया था।

माइकल ओ' ड्वायर की हत्या के बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर ले जाते अधिकारी।
माइकल ओ' ड्वायर की हत्या के बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर ले जाते अधिकारी।

13 मार्च 1940 को लंदन के काक्सटन हॉल में एक मीटिंग थी। इस मीटिंग में माइकल ओ' ड्वायर भी आने वाला था। उधम सिंह भी मीटिंग में एक पिस्टल लेकर पहुंचे। पिस्टल को उन्होंने एक किताब में छुपाया था।

मीटिंग में माइकल ओ' ड्वायर पर उधम सिंह ने ताबड़तोड़ फायरिंग की। इससे डायर की मौके पर ही मौत हो गई। क्रांतिकारी उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली थी। उधम सिंह माइकल ओ' ड्वायर को मारने के बाद वहां से भागे नहीं। चुपचाप खड़े रहे।

पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन पर मुकदमा चला। 4 जुलाई 1940 को कोर्ट ने उधम सिंह को दोषी करार दिया। भारत के इस निडर वीर को आज ही के दिन 1940 में पेंटनविले की जेल में फांसी दे दी गई।

1658: औरंगजेब के हाथों में आई सत्ता

1658 में आज ही के दिन औरंगजेब मुगल साम्राज्य का सुल्तान बना था। वो अगले 49 साल तक गद्दी पर रहा। उसने अकबर के बाद सबसे ज्यादा लंबे समय तक शासन किया था।

औरंगजेब ।
औरंगजेब ।

कहा जाता है कि औरंगजेब और उसके भाइयों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। गद्दी को लेकर अक्सर भाइयों में विवाद होता रहता था। 1657 में शाहजहां के बीमार पड़ने के बाद सत्ता का विवाद और बढ़ गया। औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बना लिया, भाइयों का कत्ल कर दिया और खुद राजा बन बैठा।

31 जुलाई को इतिहास में इन महत्वपूर्ण घटनाओं की वजह से भी याद किया जाता है...

2006: क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने अपने भाई राउल कास्त्रो को सत्ता सौंपी।

1993: भारत के पहले तैरते हुए समुद्री संग्रहालय का कलकत्ता में उद्घाटन हुआ।

1980: हिदी फिल्मों के महान गायक मोहम्मद रफ़ी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ।

1498: क्रिस्टोफर कोलंबस अपनी तीसरी यात्रा के दौरान 'त्रिनिदाद' द्बीप पहुंचे।

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