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सुप्रीम कोर्ट / तीन तलाक कानून की वैधता को चुनौती, शीर्ष अदालत ने सरकार से 4 हफ्ते में जवाब मांगा



सुप्रीम कोर्ट। -फाइल सुप्रीम कोर्ट। -फाइल
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सुप्रीम कोर्ट। -फाइलसुप्रीम कोर्ट। -फाइल

  • सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया
  • तीन तलाक बिल संसद के दोनों सदनों से पास हुआ, इसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 31 जुलाई को मंजूरी दी थी

Dainik Bhaskar

Aug 23, 2019, 04:08 PM IST

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक कानून की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से इस मामले पर चार हफ्ते में जवाब मांगा। याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक कानून असंवैधानिक है।

 

जमायत-ए-उलेमा हिंद और समस्था केरला जमीतुल उलेमा और एक अन्य ने तीन तलाक कानून को चुनौती दी। इस पर जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया।

 

खुर्शीद ने कहा- कानून की वैधता को परखा जाए
याचिकाकर्ता के वकील सलमान खुर्शीद ने कहा कि इस कानून की वैधता को परखा जाए। इस कानून से मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। इसमें मुस्लिम पुरुषों को तीन साल तक की सजा समेत अन्य प्रावधान सही नहीं हैं। याचिकाकर्ताओं ने ट्रिपल तलाक को गंभीर अपराध को दायरे में लाने के प्रावधान को असंवैधानिक करार देने की मांग की है।

 

आरोपी पुरुष को तीन साल तक की सजा का प्रावधान

तीन तलाक (मुस्लिम महिला-विवाह अधिकार संरक्षण) बिल 30 जुलाई को राज्यसभा में पास हो गया था। राज्यसभा में वोटिंग के दौरान बिल के पक्ष में 99 और विरोध में 84 वोट पड़े। बिल 25 जुलाई को लोकसभा से पास हो चुका था। इसके अगले दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तीन तलाक बिल को मंजूरी दे दी थी। तीन तलाक कानून के तहत दोषी पुरुष को 3 साल की सजा सुनाई जा सकती है। साथ ही पीड़ित महिलाएं अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारे-भत्ते की मांग भी कर सकती हैं।

 

2017 में आया था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

  • अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की 1400 साल पुरानी प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार से कानून बनाने को कहा था।
  • सरकार ने दिसंबर 2017 में लोकसभा से मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक पारित कराया लेकिन राज्यसभा में यह बिल अटक गया था।
  • विपक्ष ने मांग की थी कि तीन तलाक के आरोपी के लिए जमानत का प्रावधान भी हो। 
  • 2018 में विधेयक में संशोधन किए गए, लेकिन यह फिर राज्यसभा में अटक गया।
  • इसके बाद सरकार सितंबर 2018 में अध्यादेश लेकर आई। इसमें विपक्ष की मांग को ध्यान में रखते हुए जमानत का प्रावधान जोड़ा गया। अध्यादेश में कहा गया कि तीन तलाक देने पर तीन साल की जेल होगी।

 

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