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यादगार / भारत-पाकिस्तान के बंटवारे और स्वतंत्रता संग्राम के हालात बयां करतीं दो मशहूर कहानियां...



Two famous stories describing the circumstances of the partition of India and Pakistan and the freedom struggle ...
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Two famous stories describing the circumstances of the partition of India and Pakistan and the freedom struggle ...

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:35 PM IST

बंटवारे के बाद की स्थिति पर सआदत हसन मंटो की कहानी
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुक़ूमतों को ख्याल आया कि जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए। 

 

आख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्रर हो गया। एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पंद्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज़ सुनने में आते थे,’ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।’ वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पंद्रह बरस में वह एक-एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फूल गईं थी। हिंदुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के बारे में जब कभी पागलखाने में गुफ़्तगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख्याल है तो जवाब देता,’ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।’


लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है, जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। उस पागल का नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे। तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। बिशन सिंह की बारी आई। उसने अफसर से पूछा,‘टोबा टेक सिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?’ 
अफसर हंसा,‘पाकिस्तान में।’

 

यह सुनकर बिशन सिंह दौड़कर अपने बाकी साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इनकार कर दिया और ज़ोर-ज़ोर- से चिल्लाने लगा,‘टोबा टेकसिंह कहां है? ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एंड पाकिस्तान।’ उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेकसिंह हिंदुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वो न माना।

 

जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरम्यिान में एक जगह इस अंदाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले शांत बिशन सिंह हलक से एक आसमान को फाड़ देने वाली चीख निकली। इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आए और देखा कि वो आदमी जो पंद्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर, खारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था। इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में ज़मीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।

टूटे शीशे 

 

स्वामी ने जलाई अपनी टोपी: आरके नारायणन की कहानी
15 अगस्त 1930 के दिन मालगुड़ी के लगभग 2000 नागरिक बंबई के सुप्रसिद्ध राजनेता गौरीशंकर की गिरफ्तारी के विरुद्ध सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए सरयू नदी के दाहिने तट पर एकत्रित हुए। खद्दर के कपड़े पहने एक तेजतर्रार आदमी लकड़ी से बने मंच पर खड़ा होकर भाषण दे रहा था। चारों दिशाओं में गूंजती जोरदार आवाज़ में पहले उसने गौरीशंकर के राजनीतिक जीवन और उपलब्धियों के बारे में बताया, फिर अचानक चीख कर बोला- ‘दोस्तों आज हम गुलाम हैं। यह वह देश है, जिसने कालीदास दिया, गौतम बुद्ध और शंकराचार्य दिए। और अब हमारी दशा क्या है? इसके बाद वह जोश से भरकर बोला, आज हम गुलामों के भी गुलाम हैं।’ फिर उसने कहा कि ‘अंग्रेज नौकरशाही ने दबाकर और भूखा रखकर हमें कमजोर बना दिया है। हमें ज्यादा कुछ नहीं करना है अगर सब भारतीय इंग्लैंड पर थूक भी दें तो उसी के सैलाब में इग्लैंड डूब जाएगा’। 
स्वामीनाथन ने मणि से पूछा कि क्या यह सच है?
क्या सच है?

 

यही कि हम थूककर यूरोप काे डुबा सकते हैं। 
हो सकता है... नहीं तो नेताजी यह बात कहते ही क्यों?
सभा में तय हुआ कि विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाएगा। स्वामीनाथन के लिए और मणि के लिए भाषण का यह हिस्सा समझ से बाहर था। लेकिन वक्ता की बातें अभी भी उसके दिमाग में घूम रही थीं। किसी ने स्वामीनाथन से पूछा, यंग मैन तुम अपने देश को गुलाम बनाए रखना चाहते हो? 
उसका जवाब था-हरगिज नहीं। 

 

...लेकिन टोपी तो तुम विदेशी पहने हो। उसने कहा।
इतना सुनते ही स्वामी ने अपनी टोपी आग में फेंक दी। 


दूसरे दिन सवेरे स्वामीनाथन को ख्याल आया कि उसने टोपी आग में फेंक दी है यह बात पिताजी को पता नहीं थी। आज स्कूल क्या पहन कर जाएगा। पिताजी को बताना उचित नहीं लगा। लेकिन बिना टोपी स्कूल भी नहीं जा सकता था। यह समस्या भाग्य के भरोसे छोड़ वह सिर्फ कोट पहनकर स्कूल के लिए चला। भाग्य ने वाकई साथ दिया और उस दिन स्कूल में हड़ताल हो गई। स्वामी का इरादा था कि पिताजी से इस फसाद की बात ही न करे। लेकिन शाम को जैसे ही पिताजी घर आए, स्वामीनाथन से बोले, ‘स्कूली लड़कों ने भी बहुत दंगा किया, तुमने क्या किया?’ स्वामी ने बताना शुरू किया और सोचा इसी से टोपी की समस्या का हल भी निकाला जा सकता है। फिर बोला, ‘कितनी भीड़ थी। और किसी ने मेरी टोपी भी उतार ली और उसके चीथड़े करके फेंक दिया।

 

...कल मुझे स्कूल जाने से पहले नई टोपी चाहिए।’
उसने यह क्यों किया? पिताजी ने पूछा। 
‘क्योंकि वह विदेशी थी?’
‘किसने कहा विदेशी थी! खद्दर भंडार से दो रुपए में खरीदी थी। 
‘मुझे कुछ नहीं पता। मैंने रोका तो वह मुझे मारने दौड़ा।’
पिताजी गुस्से में बोले, ‘तुम्हें उसे पटक देना था। मैंने वह टोपी और तुम्हारे कोट का कपड़ा एक ही दिन खद्दर भंडार से खरीदा था। अगर कोई इसे खद्दर न माने तो अंधा है वह।’ स्वामी बेवकूफों की तरह सामने ताक रहा था। उसने विदेशी की धुन में स्वदेशी ‘खद्दर’ जला दिया था। 

 

(दोनों कहानियां संपादित और मूल कहानियों का अंश हैं)

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