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ब्लिंकन 40 साल बाद भारत आए:अमेरिकी विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की, बोले- कोरोना को मिलकर हराएंगे

नई दिल्ली2 महीने पहले
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर फोटो पोस्ट कर लिखा, ब्लिंकन से मिलकर अच्छा लगा।

अमेरिकी विदेश मंत्री का पद संभालने के बाद पहली बार भारत आए एंटनी ब्लिंकन ने बुधवार को प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, NSA सहित कई महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात की। ब्लिंकन तिब्बत के धर्म गुरु दलाई लामा के प्रतिनिधि मंडल से भी मिले। उन्होंने क्वाड से लेकर वैक्सीन तक हर मुद्दे पर अमेरिका की नीति को सामने रखा।

ब्लिंकन ने शाम के समय पीएम मोदी से मुलाकात की। उन्होंने डिफेंस, ट्रेड, इंवेस्टमेंट और क्लाइमेट चैंज जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करने की इच्छा जाहिर की। ब्लिंकन से मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए पीएम मोदी ने लिखा- एंटनी ब्लिंकन से मिलकर अच्छा लगा। भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत करने के लिए उठाए जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कदमों का मैं सवागत करता हूं। दोनों देशों के संबंध साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हैं।

अफगानिस्तान में साथ काम करने की इच्छा जताई
ब्लिंकन ने अफगानिस्तान में भारत के साथ काम करने की इच्छा जताई। ब्लिंकन ने भारत के वैक्सीनेशन प्रोग्राम के लिए 25 मिलियन डॉलर (करीब 185 करोड़ रु.) दिए। उन्होंने कहा कि मुझे भारत आकर अच्छा लगा। यहां मैं 40 साल पहले अपने परिवार के साथ आया था।

सबसे जरूरी अफगानिस्तान के मुद्दे पर क्या बोले
हमने अफगानिस्तान से सेना बुला ली है, लेकिन हमारी मौजूदगी वहां बनी रहेगी। वहां हमारा शक्तिशाली दूतावास है। वहां की आर्थिक मजबूती और विकास के लिए हम मदद करते रहेंगे। हम इलाके में शांति स्थापित करना चाहते हैं। भारत और अमेरिका दोनों अफगानिस्तान में मजबूत सरकार और शांति के समर्थक हैं। अफगानिस्तान के विकास में भारत का योगदान रहा है और आगे भी रहेगा।

दलाई लामा के प्रतिनिधि मंडल से मिले
ब्लिंकन ने दलाई लामा के प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात की। जाहिर है, इससे चीन को मिर्ची लगेगी। ब्लिंकन ने इस मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर की। उन्होंने कहा कि सिविल सोसाइटी के नेताओं से मिलकर खुशी हुई। भारत और अमेरिका लोकतंत्र समर्थक रहे हैं।

दलाई लामा के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करते एंटनी ब्लिंकन।
दलाई लामा के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करते एंटनी ब्लिंकन।

जयशंकर से मुलाकात की
विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात के बाद ब्लिंकन ने कहा भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत करना राष्ट्रपति जो बाइडेन का संकल्प है। कोरोना हो या नई टेक्नोलॉजी का बुरा असर, हमारे नागरिकों ने इनका डटकर मुकाबला किया है। इनसे कोई भी देश अकेले नहीं निपट सकता। अब देशों को पहले से भी ज्यादा एक-दूसरे का सहयोग करने की जरूरत है। इधर, ब्लिंकन से मिलने के बाद जयशंकर ने कहा कि हिंद-प्रशांत महासागर में शांति और समृद्धि दोनों देशों के लिए जरूरी है। हमें आतंकवाद जैसी चुनौतियों के खिलाफ मिलकर काम करना चाहिए।

ब्लिंकन ने एस जयशंकर से मुलाकात के दौरान संबंध मजबूत करने पर जोर दिया।
ब्लिंकन ने एस जयशंकर से मुलाकात के दौरान संबंध मजबूत करने पर जोर दिया।

अजीत डोभाल से भी मिले
NSA अजीत डोभाल से मिलने के बाद ब्लिंकन ने कहा कि सुरक्षा, रक्षा, आर्थिक और तकनीक से संबंधित क्षेत्रों में रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत हुई। दोनों की बैठक करीब एक घंटे चली। इसमें लोकल से लेकर ग्लोबल सिक्योरिटी तक कई मुद्दों पर चर्चा हुई।

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने NSA अजीत डोभाल से मुलाकात की।
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने NSA अजीत डोभाल से मुलाकात की।

कोविड-19 के खिलाफ मिलकर काम करेंगे
कोरोना महामारी को खत्म करने को लेकर हम प्रतिबद्ध हैं। भारत और अमेरिका क्वाड वैक्सीन प्रोग्राम के तहत कोरोना के खिलाफ मिलकर काम करेंगे। कोविड-19 ने दोनों देशों को बेहद नुकसान पहुंचाया है। महामारी की शुरुआत में भारत ने अमेरिका की जो मदद की थी, हम उसे कभी भूल नहीं सकते। हम मिलकर महामारी को खत्म करने में ग्लोबर लीडर का रोल निभा सकते हैं।

दलाई लामा से क्यों चिढ़ता है चीन?
23 मई, 1951 को एक समझौते के बाद चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। दरअसल चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी में चीन का हिस्सा रहा है इसलिए तिब्बत पर उसका हक है। तिब्बत चीन के इस दावे को खारिज करता है। 1912 में तिब्बत के 13वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। उस समय चीन ने कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन करीब 40 सालों बाद चीन में कम्युनिस्ट सरकार आ गई।

विस्तारवादी नीतियों के चलते 1950 में चीन ने हजारों सैनिकों के साथ तिब्बत पर हमला कर दिया। करीब 8 महीनों तक तिब्बत पर चीन का कब्जा चलता रहा। आखिरकार तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 17 बिंदुओं वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के बाद तिब्बत आधिकारिक तौर पर चीन का हिस्सा बन गया। हालांकि दलाई लामा इस संधि को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ये संधि जबरदस्ती दबाव बनाकर करवाई गई थी।

मार्च 1959 में खबर फैली कि चीन दलाई लामा को बंधक बनाने वाला है। इसके बाद हजारों की संख्या में लोग दलाई लामा के महल के बाहर जमा हो गए। आखिरकार एक सैनिक के वेश में दलाई लामा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से भागकर भारत पहुंचे। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन को ये बात पसंद नहीं आई। 2010 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मुलाकात की थी।

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