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वैलेंटाइन डे / शबाना ने भास्कर के लिए लिखी अम्मी-अब्बा और अपनी मोहब्बत की कहानी

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 01:22 PM IST


कैफी (बाएं) और शौकत आज़मी। (फाइल) कैफी (बाएं) और शौकत आज़मी। (फाइल)
शबाना आज़मी और जावेद अख्तर। (फाइल) शबाना आज़मी और जावेद अख्तर। (फाइल)
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कैफी (बाएं) और शौकत आज़मी। (फाइल)कैफी (बाएं) और शौकत आज़मी। (फाइल)
शबाना आज़मी और जावेद अख्तर। (फाइल)शबाना आज़मी और जावेद अख्तर। (फाइल)
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  • शबाना ने बताया- कैफी और शौकत के बीच मुशायरे में ही हो गया था प्यार, अब्बा ने खून से लिखा था अम्मी को खत
  • \'मैंने जावेद में अब्बू का अक्स तलाशा और पाया, उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का है\'

ये उस दौर की बात है जब हिंदुस्तान में शायर का रुतबा फिल्मी सितारों जैसा था। ये वाकया है 1947 का। हिंदुस्तान तब आज़ाद नहीं हुआ था। हैदराबाद में एक मुशायरा हो रहा था जिसमें कैफी साहब भी शिरक़त कर रहे थे और शौकत मुशायरा सुनने पहुंचीं। कैफी साहब ने अपनी नज़्म "औरत पढ़ी जिसके मशहूर अश्आर हैं- "उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे, उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे...।" इस शायर पर 22 साल की शौकत फिदा हो गईं। उन्होंने यहीं तय कर लिया कि शादी करेंगी तो कैफी से। 

 

शौकत ने पहले लिया सरदार जाफ़री से ऑटोग्राफ
मुशायरे के बाद शौकत ऑटोग्राफ लेने पहुंचीं तो कॉलेज की लड़कियों ने कैफी साहब को घेर रखा था। ये देख अम्मी सरदार जाफ़री का ऑटोग्राफ लेने पहुंच गईं। जब कैफी साहब के पास से भीड़ छंटी तो अम्मी ने अपनी ऑटोग्राफ बुक कैफी की ओर बढ़ा दी। कैफी साहब ने उन्हें जाफ़री साहब के पास जाते हुए देख लिया था। उन्होंने शौकत की डायरी में बहुत ही हल्का सा शेर लिख दिया जबकि उनकी सहेली ज़किया के लिए उन्होंने बेहद ख़ूबसूरत शेर लिखा। शौकत जलकर कोयला हो गईं। उन्होंने कैफी साहब से पूछा कि आपने मेरे लिए इतना ख़राब शेर क्यों लिखा? कैफी बोले- आप मुझसे पहले जाफ़री साहब से ऑटोग्राफ लेने क्यूं गईं? यही से दोनों की मोहब्बत शुरू हुई। उस वक़्त अम्मी की मंगनी किसी और से हो चुकी थी। जब उन्होंने घर में अपनी मोहब्बत का ऐलान किया तो कोहराम मच गया।

 

कैफी ने खून से लिखा था ख़त 
मेरे अब्बा ने उन्हें खून से ख़त लिखा। इस पर मेरे नाना ने कहा कहीं बकरे के ख़ून से ख़त लिख दिया होगा। लेकिन वो ख़ून अब्बू का ही था... अम्मी जानती थीं। फिर एक दिन बग़ैर किसी को बताए नाना मेरी अम्मी को मुंबई ले आए। ये दिखाने कि कैफी कैसी ज़िंदगी जीते हैं। सब देखकर शौकत बोलीं- मैं फिर भी उन्हीं से शादी करूंगी और नाना ने अम्मी की शादी उनकी मां और भाई की गैरमौजूदगी में ही कर दी।
 
मेरी अम्मी बेहतरीन कुक हैं जबकि इस मामले में मैं अम्मी के बिलुकल उलट हूं। जादू (जावेद साहब के बचपन का नाम) आज भी पुरउम्मीद हैं कि एक दिन मैं उनके लिए बहुत लज़ीज़ खाना पकाऊंगी। मैं जिस दिन कुक करती हूं, सब किसी न किसी बहाने से डाइनिंग टेबल से खिसकने की कोशिश करते हैं। 

 

'जावेद में अब्बू को देखा'
अब्बा और जादू में कई बातें मिलती-जुलती हैं। मैंने उनमें हमेशा अब्बू का अक्स तलाशा और पाया भी। लेकिन वो एक बात जिस पर मैं सबसे ज्यादा फ़िदा हूं वो है जादू का सेंस ऑफ ह्यूमर। इतने महीन हैं हंसाने के मामले में कि मैं जब भी उनके साथ होती हूं, बस खिलखिलाती हूं। हमें जानने वाले हैरत करते हैं कि कोई अपने शौहर की बातों पर इतना कैसे हंस सकती है। एक मर्तबा मैंने जावेद से कहा- जावेद मैं जल्दी से बहुत अमीर होना चाहती हूं। सारे ऐश-ओ-आराम चाहती हूं। तो तुम जल्दी से कुछ ऐसा करो कि बहुत पैसा आ जाए तुम्हारे पास। चंद पल ठहरकर वो कहते हैं, तुम्हारी टाइमिंग ज़रा ग़लत हो गई। मैं तो ख़ुद ये ख़्वाहिश लिए बैठा हूं कि गोवा में तुम्हारे पैसों पर बम्पर राइड करते हुए ज़िंदगी गुज़ारूं। जैसी दोस्ती अम्मी और अब्बू में थी, वैसी ही हम दोनों में है। 

 

'आशिक़मिज़ाज हैं जावेद'
बड़ा बातूनी रिश्ता है हमारा लेकिन शादी से पहले जो ऊहापोह थी तब तीन महीने गहरी ख़ामोशी आ गई थी हमारे बीच। हमने तय किया कि अब नहीं मिलेंगे। नहीं मिले। हालांकि ये आज के दौर के मानिंद ब्रेकअप नहीं था। तीन महीनों के बाद हम मिले तो यह फैसला लेने के लिए आगे क्या करना है। मिले तो इतनी बातें कीं हमने कि यही भूल गए कि मिले किसलिए थे। जादू आशिक़मिज़ाज भी ख़ूब हैं। शादी के बाद हम कहीं जा रहे थे। रास्ते में कहीं फूल दिखे, मैंने कहा कितने ख़ूबसूरत फूल हैं। मैं ज़रा इधर-उधर हुई और जादू ने उस दुकान के सारे फूल खरीद कर फिएट में रखवा लिए। 


एक अहसासों से जुड़ा किस्सा और है, उस वक्त लोनावला में हमारा घर बनाया जा रहा था। मेरा टेस्ट जादू से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ था। मैं छोटा वीकेंड हाउस चाह रही थी और जादू महलों जैसा आलीशान बंगला बनाना चाह रहे थे। इस दौर में हमारी बहुत बहस हुई। फिर उनके एक दोस्त ने मुझसे कहा - जावेद ने बहुत बुरे दिन देखे हैं। सड़कों पर रहा है वो, और ये घर उसका ख़्वाब है। बस मैं समझ गई। और फिर जैसा जादू चाहते थे, उसमें बख़ुशी शामिल हुई। 

 

'जावेद में एक भी रोमांटिक बोन नहीं है'
जावेद के साथ किसी रोमेंटिक जगह जाने की ज़रूरत मुझे नहीं महसूस होती। वो घर की चारदीवारी को ही रूमानी बना देते हैं। हम दोस्ताना ही रहे हमेशा एक दूसरे के साथ और यही हमारी कामयाबी है जो जादू हमेशा दोहराते हैं कि शादी भी हमारी दोस्ती का कुछ बिगाड़ न सकी। 


लड़कियां मुझसे पूछती हैं कि जावेद साहब इतनी रूमानी शायरी लिखते हैं, तो वो बड़े रोमेंटिक होंगे। आपके लिए कितना अश्आर लिख देते होंगे। मैं उन्हें कहती हूं - जावेद में एक भी रोमांटिक बोन नहीं है। कभी मैंने पूछा कि तुम शायर हो, कभी मेरे लिए तो कुछ लिखते नहीं? तो बोले- सर्कस में कलाबाज़ियां करने वाला शख़्स घर पर भी उल्टा लटकता है क्या? 

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