करन थापर का इलेक्शन एनालिसिस / सबसे बड़ा सवाल, क्या पुलवामा-बालाकोट का असर चुनाव तक रहेगा?



पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे। पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे।
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पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे।पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे।

करन थापर

करन थापर

Apr 11, 2019, 05:49 PM IST

करन थापर. चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ ही मेरा मानना है कि एक सवाल जो संभवत: सबके होंठों पर है : क्या पुलवामा में आंतकी हमले और बालाकोट एयर स्ट्राइक ने राजनीतिक परिदृश्य व चुनावी गणना को बदल दिया है या यह सिर्फ तात्कालिक असर है जो समय के साथ फीका पड़ जाएगा? मेरा शुरुआती जवाब है कि मैं इस सवाल के पहले हिस्से से सहमत हूं। लेकिन जितना अधिक मैं इस पर विचार करता हूं, लगता है कि यह उतना स्पष्ट नहीं है जैसा यह पहली नजर में दिखता है।

 

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आज राष्ट्रवाद और पाकिस्तान विरोधी भावनाएं  बेरोजगारी, राफेल, जीएसटी, नोटबंदी जैसे पहले के मुद्दों पर हावी हो गई हैं। इसके केंद्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने में सक्षम मजबूत और निर्णय लेने वाले नेता की हमारी पारंपरिक तड़प है। 1971 में इंदिरा गांधी की तरह 2019 में नरेंद्र मोदी इस कसौटी पर फिट बैठते हैं। क्या खुश और कृतज्ञ राष्ट्र उनके लिए वोट करेगा? संभव है।

 

2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भाजपा ने 2017 में यूपी में जबरदस्त जीत हासिल की। क्या यह फिर हो सकता है? शायद। पुलवामा आतंकी हमले में शहीद सीआरपीएफ के 40 जवानों में से 30 फीसदी यूपी से ही आते हैं। इसके अलावा यहां से ही तीनों सेनाओं में सर्वाधिक लोग भर्ती होते हैं। इसीलिए यहां पर राष्ट्रीय जोश का असर अधिक दिख सकता है।

हालांकि, इसके विपरीत विचार भी संभव है। 1999 में कारगिल विजय के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी केवल उतनी ही सीटें जीत सके थे, जितनी उन्हें 1998 में मिली थीं। 26/11 के बावजूद 2009 में कांग्रेस पहले से 60 सीटें अधिक लाई थी। इसलिए यह साफतौर पर नहीं कहा जा सकता कि राष्ट्रवादी भावनाओं और चुनाव परिणामों के बीच कोई सीधा संबंध है। यह किसी भी ओर जा सकता है।

 

अब यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि बालाकोट एयर स्ट्राइक का चुनावों पर परिणाम सर्जिकल स्टाइक से अलग रहेगा। इसकी वजह यह है कि भारत आज वैसा नहीं है जैसा दो साल पहले था। ग्रामीण संकट व किसानों की आत्महत्या के मामले 2017 से बढ़े हैं। इसलिए ये लोग जब वोट डालने जाएंगे तो वे अपनी तात्कालिक चिंताओं और कष्टों को देखकर ही फैसला लेंगे। मोदी की किसान योजना उनकी चिंता दूर करने में सफल रही है ऐसा मानना कठिन है। इसके अलावा बेरोजगारी दूसरा बड़ा कारक है। देश में बेरोजगारी की दर 7.3 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। देश के युवा मोदी के फैन हो सकते हैं, लेकिन नौैकरी न होने का दुख क्या उन्हें बालाकोट पर जश्न मनाने देगा?
 

यह सब इस बात पर निर्भर होगा कि विपक्ष इन मसलों पर कैसे खेलता है। बालाकोेट की सफलता पर सवाल उठाने, पुलवामा में इंटेलीजेंस विफलता पर सरकार को कोसने या राफेल को घोड़े को ज्यादा भगाने की बजाय विपक्ष को इन जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार की विफलता को उठाना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं तो वोटिंग के दिन पुलवामा-बालाकोट हावी नहीं रहेगा। लेकिन, क्या यह हो सकता है? अब तक तो मैं इसका जवाब हां में नहीं दे सकता।

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