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  • Girish Karnad passes away at 81; Lesser known facts about Girish Karnad; played RAW officer in ‘Tiger Zinda Hai’

शोक / अभिनेता गिरीश कर्नाड का 81 की उम्र में निधन, शिकागो से प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर सिनेमा में आए थे



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  • गिरीश कर्नाड लंबे समय से बीमार थे, मौत की वजह मल्टिपल ऑर्गन फेल्योर बताई गई
  • 1978 में आई फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड और चार फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले थे
  • कर्नाड को पद्म भूषण, पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था

Dainik Bhaskar

Jun 10, 2019, 06:22 PM IST

बेंगलुरु. भारतीय सिनेमा के जाने-माने चरित्र अभिनेता और लेखक गिरीश कर्नाड का सोमवार को लंबी बीमारी के बाद बेंगलुरु में निधन हो गया। वे 81 साल के थे। मौत की वजह मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर बताई गई है। उन्हें भारत के जाने-माने समकालीन लेखक, अभिनेता, फिल्म निर्देशक और नाटककार के तौर पर जाना जाता था। गिरीश यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में प्रोफेसर भी रहे। नौकरी में मन नहीं लगने पर भारत लौटे, फिर पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए।

 

कर्नाड का जन्म 19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था। कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद आगे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। उन्होंने चेन्नई की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में 7 साल तक काम किया। इसके बाद वे थियेटर करने लगे। वे पद्म भूषण, पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए। 1978 में आई फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड और इसके बाद चार फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले।

 

सलमान की टाइगर सीरीज में रॉ अफसर की भूमिका निभाई

गिरीश ने सलमान खान की फिल्म ‘एक था टाइगर' और ‘टाइगर जिंदा है' में भी काम किया था। टाइगर जिंदा है बॉलीवुड में उनकी आखिरी फिल्म थी। इसमें उन्होंने डॉ. शेनॉय का किरदार निभाया था। उन्होंने कन्नड़ फिल्म संस्कार (1970) से एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग करियर शुरू किया था। इसके लिए उन्हें कन्नड़ सिनेमा का पहला प्रेसिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड मिला। बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आई ‘जादू का शंख’ थी। इसके बाद फिल्म निशांत, शिवाय और चॉक एन डस्टर में भी काम किया।

 

पहला नाटक कन्नड़ में लिखा था
गिरीश कर्नाड की कन्नड़ और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं भाषाओं में एक जैसी पकड़ थी। उनका पहला नाटक कन्नड़ में था, जिसे बाद में अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। उनके नाटकों में 'ययाति', 'तुगलक', 'हयवदन', 'अंजु मल्लिगे', 'अग्निमतु माले', 'नागमंडल' और 'अग्नि और बरखा' काफी चर्चित हैं। कर्नाड 40 सालों तक नाटककारों के बीच अपनी धाक जमाए रखे। उन्होंने समकालीन अवधारणाओं पर बखूबी लिखा।

 

इन पुरस्कारों से नवाजे गए
गिरीश को 1992 में पद्म भूषण, 1974 में पद्मश्री, 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1998 में उन्हें कालिदास सम्मान मिला था। 1978 में आई फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। उन्हें 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया।

 

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर दुख जताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, ‘‘गिरीश कर्नाड को उनके बहुमुखी अभिनय के लिए हमेशा याद किया जाएगा। अपनी पसंद के मुद्दों पर उन्होंने पूरे उत्साह के साथ विचार व्यक्त किए। उनके कार्य आने वाले वर्षों में भी लोकप्रिय बने रहेंगे। उनके निधन से दुखी हूं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।’’ कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने भी शोक जताया।

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