जीरो वैली / यहां नदी से जितना पानी लेते हैं, उतना लाैटाते भी हैं; खेती मशीन या पशुओं से नहीं, हाथों से होती है



जीरो घाटी। जीरो घाटी।
चेहरे पर बने टैटू अपातिनी महिलाओं की पहचान है। हालांकि 1970 के बाद यह प्रथा खत्म हो गई है। चेहरे पर बने टैटू अपातिनी महिलाओं की पहचान है। हालांकि 1970 के बाद यह प्रथा खत्म हो गई है।
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जीरो घाटी।जीरो घाटी।
चेहरे पर बने टैटू अपातिनी महिलाओं की पहचान है। हालांकि 1970 के बाद यह प्रथा खत्म हो गई है।चेहरे पर बने टैटू अपातिनी महिलाओं की पहचान है। हालांकि 1970 के बाद यह प्रथा खत्म हो गई है।

  • अरुणाचल में 5600 फीट की ऊंचाई पर स्थित जीरो घाटी में जीवनयापन करती है अपातिनी जनजाति
  • आपातिनी ने ही यहां चावल की खेती शुरू की और सिंचाई के लिए नालीनुमा नहरों के चैनल बनाए

Dainik Bhaskar

Jul 08, 2019, 11:36 AM IST

जीरो वैली. अरुणाचल प्रदेश के लोअर सुबंसरी जिले में समुद्रतल से 5600 फीट की ऊंचाई पर स्थित जीरो घाटी दुनिया के कुछ उन मुट्ठीभर ठिकानों में से है, जहां आज भी प्रकृति और परंपराओं की जुगलबंदी कायम है। हम जब यहां पहुंचे  तो आठ-दस महिलाओं का समूह खेतों में काम कर रहा था। यह महिलाएं बारी-बारी से एक-दूसरे के खेत में काम करने जा रही हैं।

 

दुनिया में संभवत: अपनी किस्म‍ की सबसे अनूठी खेती जीरो वैली में ही हो रही है। यहां खेती में किसी पशु या मशीन की मदद नहीं ली जाती, बल्कि सारा काम सिर्फ महिलाएं अपने हाथों से करती हैं। महिलाएं ही खेती करती हैं और वही परिवार की मुखिया भी होती हैं। यह वही अपातिनी जनजाति है, जिनकी महिलाएं काले नोज प्लग पहनती हैं और जिनके माथे से ठोढ़ी तक टैटू होते हैं।

हर व्यक्ति को नहर की देखभाल करनी होती है

  1. पानी की बचत और हर बूंद का सही इस्तेमाल इनकी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। इतना ही नहीं यहां नियम है कि साल में एक दिन हर व्यक्ति को नहर की देखरेख के लिए देना होगा। खेतों की इन नालीनुमा नहरों में मछली पालन भी हो रहा है।

  2. मछलियां जो कुछ उगलती हैं वो खेतों में समाता रहता है, ऑर्गेनिक खाद बनकर। वैसे यहां खेती ऑर्गेनिक ही होती है। इसके लिए भी पूरी व्यवस्था बनी हुई है। मुर्गियों और सुअरों के बाड़ों से एकत्र अपशिष्ट का इस्तेमाल खेतों में होता है।

  3. घरों में चूल्हों से निकली राख, तिनके-पत्तियां, डंठल, घरों में फलों-सब्जियों समेत अन्य ऑर्गेनिक कचरा कहीं और न जाकर खेतों में ही पहुंचाया जाता है। ऐसा सदियों से हाे रहा है। जीरो वैली के हॉन्ग, सिरो और ओल्ड जीरो गांव में इस खेती की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ा रहे हैं।

  4. अपातिनियों की इस घाटी में करीब 48% भूमि पर धान की खेती और मछली पालन हो रहा है, जबकि आसपास का 33% इलाका जंगलों से ढंका है, 17% में बांस खड़े हैं, शेष 2% पर घर-घर में बाग-बगीचे हैं। कीवी, शहतूत, अलूचे जैसे फलाहारी वृक्षों से भरे-पूरे। यहां प्रति हेक्टेयर धान की उपज बाकी भागों की तुलना में 3 से 4 गुना ज्यादा है।

  5. आधुनिकता से दूर नहीं- सितंबर में म्यूजिक फेस्टिवल

    वैली में हर साल सितंबर में म्यूजिक फेस्टिवल होता है। इसमें स्थानीय और दूसरे प्रांतों से कलाकार आते हैं। लाेग आधुिनक संगीत का आनंद लेते हैं। यहां के स्कूल में जीरो वेस्ट प्रोग्राम चलाया जा रहा है, जिसमें सिखाया जा रहा है कि वैली को कैसे हमेशा ‘ग्रीन एंड क्लीन’ बनाए रखा जाए। छठवीं और सातवीं क्लास में बच्चों को इसकी ट्रेनिंग दी जाती है।

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