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हो या ना हो हो या ना हो

6 वर्ष पहले
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भागलपुर. सेवानिवृत्त शिक्षिका शोभा सिंह की आंखें आज भी उन दिनों को याद कर नम हो जाती हैं, जब अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। संसाधनों की कमी और आर्थिक तंगी के बावजूद एक मां का संकल्प था कि अपने दो बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर ही रहेंगीं। मां शोभा सिंह ने अपने संकल्प को आकार दिया और अंतत: सपने सच हो गए। पेट काटकर बच्चों को पढ़ाने पर पैसे खर्च किए। कर्ज भी लेने पड़े।
पिता ने ईंट भट्ठे में बैलगाड़ी चलाई। फिर दोनों बेटों ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर मुकाम पाया। बड़ा लड़का दुष्यंत सिंह बिजनेस करता है और एक पेट्रोल पंप का मालिक है। छोटा लड़का अभय सिंह आईपीएस बना। 14 साल पहले सागर (एमपी) में एसपी बने। करीब डेढ़ माह पहले अभय डीआईजी में प्रोन्नत हुए हैं। फिलवक्त वे इंदौर ग्रामीण में कार्यरत हैं।
शोभा के संकल्प को मिला पति का साथ और रंग लाई मेहनत
शोभा के संकल्प को पूरा करने के लिए उनके पति ने उनका भरपूर साथ दिया। पति ने बच्चों को पढ़ाने के लिए ईंट भट्ठे पर बैलगाड़ी चलाई। आखिरकार सबकी मेहनत रंग लाई और अभय ने दूसरे प्रयास में वर्ष 2002 में आईपीएस में सफलता हासिल की। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन 10 दिसंबर 2006 को पति चंद्रमोहन सिंह का कैंसर से निधन हो गया।
शोभा कहती हैं कि हमलोगों ने प्रयास किया और भगवान का साथ मिला, जिससे बेटे को सफलता मिली। वह इस बात को याद कर दुखी हो जाती हैं कि आज बेटे के सपने साकार होने पर उसे देखने के लिए उसके पिता नहीं रहे।
जब सांप्रदायिक हिंसा को शांत करने में सफल हुए अभय
मां शोभा सिंह बताती हैं कि अभय अपने काम से भागलपुर ही बल्कि बिहार का भी मान बढ़ा रहे हैं। भोपाल में एक ऐसी जगह थी, जहां कोई पुलिस अफसर जाना नहीं चाहते थे। 2013 में वहां एक बार सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई, तब भी कोई पुलिस अफसर वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
इतना ही नहीं जब अभय सिंह जाने लगे तो उन्हें भी वहां जाने से रोका जाने लगा। इस पर अभय सिंह ने उन लोगों से कहा कि मैं एक फौजी का लड़का हूं, जाऊंगा जरूर। इसके बाद वह वहां गए भी। इस दौरान हिंसा में गोलीबारी भी हुई। एक गोली अभय को छूकर निकल गई, लेकिन अभय ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी सूझ-बूझ से हिंसा को शांत करने में सफल हो गए।
संबंधियों के यहां न्योते में भी सोच-समझकर गए
मारूफचक की रहनेवाली शोभा सिंह 2012 में हसनगंज मध्य विद्यालय की प्रधानाध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त हुईं हैं। वह मूल रूप से एकचारी की रहनेवाली हैं। पति चंद्रमोहन सिंह फौज से 1978 में सेवानिवृत्त हुए थे। उस वक्त फौज शिक्षकों की तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन बच्चों को पढ़ने-लिखने में कभी कोई दिक्कत नहीं होने दी।
बच्चों की पढ़ाई के लिए अपने खाने-पहनने और दवा तक में कटौती की। शादी-विवाह में सगे-संबंधियों के यहां से न्योता आता था तो काफी सोच-विचार करने के बाद जाती थी ताकि बच्चों की पढ़ाई पर आने वाले खर्च पर असर नहीं पड़े। महीने का राशन तक कम खरीदती थीं।
आगे की स्लाइड्स में देखें आईपीएस अभय सिंह की फोटो...
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