• Hindi News
  • ड्यूटी और बेटी दोनों जरूरी, इसलिए साथ लेकर गश्त पर निकलती हैं यह अफसर

ड्यूटी और बेटी दोनों जरूरी, इसलिए साथ लेकर गश्त पर निकलती हैं यह अफसर

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
रायपुर। पिछले दिनों एक सर्वे में महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान होने वाली व्यावहारिक समस्याओं की बात उठी थी। इसकी वास्तविकता जानने के लिए दैनिक भास्कर ने छत्तीसगढ़ में पदस्थ महिला अधिकारियों से बात की। इस दौरान हमें कई ऐसी कहानियां पता चलीं जो वुमन पावर के बेहतरीन उदाहरण हैं। बेटी को लेकर जाती हैं गश्त पर...
- रायपुर में क्राइम ब्रांच में डीएसपी की जिम्मेदारी संभाल रही अर्चना झा का मानना है कि ड्यूटी में महिला और पुरुष केवल अफसर होते हैं, फिर भी प्राकृतिक असामानता की वजह से समस्या तो आती है।
- सेंट्रल में दो साल की मैटर्निटी लीव मिलती है, राज्य में यह सिर्फ 6 माह है। अर्चना के मुताबिक, उनके समय यह छुटि्टयां केवल साढ़े चार महीने की थी। कवर्धा में प्रेग्नेंसी के अंतिम समय में मुख्यमंत्री के सात कार्यक्रम एक ही दिन में निपटाए। अंत तक फील्ड में काम किया, इसलिए कई तकलीफें हुईं।
- वे कहती हैं कि महकमे से सपोर्ट तो मिला, लेकिन कुछ दिक्कतें खुद ही उठानी पड़ती हैं। अर्चना हफ्ते में दो दिन नाइट गश्त पर रहती हैं। उनके पति की जॉब बिलासपुर में है ऐसे में बेटी को घर पर छोड़कर जाना संभव नहीं होता। इसलिए उसे लेकर गश्त पर निकलती हैं।
- कई बार पूरी रात बाहर रहना पड़ता है ऐसे में बिटिया भी उनके साथ रहती है। वे बताती हैं कि महिला पुलिस को वर्क प्लेस पर वॉशरूम नहीं मिलना बहुत बड़ी समस्या है।
एएसपी मनीषा ठाकुर की भी यही कहानी
बलरामपुर में बतौर एएसपी पदस्थ मनीषा ठाकुर की कहानी भी डीएसपी अर्चना झा जैसी है। बेटी होने के कुछ महीनों बाद वे ड्यूटी पर लौटीं, दूधमुंही बच्ची को दो-एक दिन रिश्तेदारों के हवाले छोड़ा लेकिन उसे हर घंटे-दो घंटे में लगने वाली भूख के चलते करीब छः महीने तक नाइट गश्त में उन्हें बेटी को साथ लेकर चलना पड़ा।
(संदीप राजवाड़े और पूजा जैन से बातचीत पर आधारित।)
आगे की स्लाइड्स में पढ़ें वुमन पावर की कुछ और कहानियां
(सभी फोटो: शारदा दत्त त्रिपाठी/सुधीर सागर)