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जीवन का नया अध्याय, नए सपने देखें, जुनून-जज्बे से उसे पूरा करें और खुलकर जिएं

पूरी जिंदगी दूसरों की फिक्र में लगा दी और जब खुद साठ पार पहुंचे तो मन ने कहा, अब क्या करें?

साठ के बाद जिंदगी का जश्न किस तरह जारी रखें? ये बड़ी चुनौती है ऐसा करना ज्यादा मुश्क़िल नहीं है। इसके लिए जरूरी है- थोड़ी सी योजना, बहुता-सा जज्बा और अथाह दीवानगी
Danik Bhaskar | Aug 20, 2018, 12:03 PM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. आपके गुजरे हुए सालों की गिनती नहीं, बल्कि आप कैसा महसूस करते हैं, सब कुछ इसी पर निर्भर करता है - मार्केज का ये कथन मानीखेज़ है और गुलज़ार का काव्यात्मक बयान, 'दिल तो बच्चा है जी' पूरी तरह अर्थवान है! सचमुच, सार्थक और सफल जीवन वही है, जहां दिल बचपन जैसी उत्सुकता, कौतूहल और अर्थवत्ता बचाकर रखे। हम नए सपने देखें और उन्हें पाने का जुनून व जज्बा बनाए रखें। सवाल ये उठता है कि जब बहुत जतन करने के बाद भी बालों से सफ़ेदी झांकने लगे, चेहरे की जवां चमक कहीं खोने लगे, जिस्म पर चर्बी की कई अतिरिक्त तहें जम जाएं और जिम्मेदारियों के बोझ से कंधे झुकने लगें तो ऐसी सूरत में सकारात्मकता कैसे बचाकर रखी जाए? साठ के बाद जिंदगी का जश्न किस तरह जारी रखें? ये बड़ी चुनौती है। हालांकि ऐसा करना ज्यादा मुश्क़िल नहीं है। इसके लिए जरूरी है- थोड़ी सी योजना, बहुत-से जज्बे और अथाह दीवानगी की, ताकि पूरे होशोहवास और गरिमा के साथ जिंदगी के रस को आखिरी बूंद तक पीने का जुनून बाकी रहे।

नए ख्वाब देखने का वक़्त
उम्र का हर दौर खूबसूरत हो सकता है, बशर्ते सपने जिंदा रहें। लाजिमी हो जाता है। कि नए सपने देखें और उन्हें पूरा करने की जुगत में लगे रहें। किसी भी हुनर को सीखने के लिए कभी देर नहीं होती। अच्छा होगा कि उम्रदराज लोग नए हुनर सीखें, अच्छे दोस्त बनाएं, नई जगहों पर घूमने की योजना तैयार करें, अच्छी किताबें पढ़े। सार ये कि वे सब काम करें, जो युवावस्था में करना चाहते थे, लेकिन ज़िम्मेदारियों ने उन्हें करने का अवसर नहीं दिया। साठ की उम्र के बाद जब बच्चे बड़े और आत्मनिर्भर हो गए हैं तो यही समय है, जब आप अपनी आजादी का जश्न मना सकते हैं। इसे एक नए दौर की शुरुआत की तरह लें और खुलकर सपने जिएं।

बची ख्वाहिशों की लिस्ट
उम्र के नए जश्न की बात लिखते हुए एक फ़िल्म 'बकेट लिस्ट' याद आ रही है। इसकी कथा कैंसर के आखिरी चरण में पहुंच चुके दो बुजुर्गों पर आधारित है। उनके पास चंद महीनों का जीवन शेष है। बची हुई उम्र को रो-बिलखकर काटने की जगह वे बाक़ी बची इच्छाओं की एक सूची तैयार करते हैं और चार महीने में इतनी मुकम्मल जिंदगी जी लेते हैं, जितनी ताउम्र नहीं जी सके थे। कहने का मतलब यही कि महीनों-सालों की फ़िक्र की जगह कुछ लम्हे सम्भाल लिए जाएं। जिंदगी इन्हीं छोटे-छोटे पलों मे छुपी है। सेवानिवृत्ति के बाद अक्सर लोग सोच लेते हैं कि अब करने के लिए कुछ नहीं बचा, जबकि ये सच नहीं है। जरूरी है कि हमारे पास सुबह के वक़्त बिस्तर छोड़ने की पुख्ता वजह बनी रहे। सक्रिय जिंदगी न सिर्फ अवसाद से बचाती है, बल्कि आत्मविश्वास भी बरक़रार रहता है। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, नृत्य-संगीत-योग कुकरी क्लास करना, कम निवेश वाले कारोबार संचालित करने के अलावा, और भी कई विकल्प हैं। आजकल कई निजी कम्पनियां सेवानिवृत्त लोगों को अच्छी तनख्वाहों पर वरिष्ठ पदों पर नियुक्त कर रही हैं, ताकि उनके अनुभव का लाभ उठाया जा सके। यानी एक मायने में सेवानिवृत्ति के बाद तो आपके जीवन के अनुभवों का लाभ लेने का सबसे अच्छा समय शुरू होता है। 

एक जरूरी बात
अक्सर होता ये है कि पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी के चलन और क़ायदों को मान्यता देने को तैयार नहीं होती और इस प्रक्रिया में खुद को निष्क्रिय बना लेती है। इससे उलट होना ये चाहिए कि कमउम्र लोगों की शिक़ायत या आलोचना करने की जगह नई पीढ़ी की जीवनशैली और उनकी जिंदगी की जरूरतों को समझें और सहयोगी बनें। नई तकनीक से दोस्ती करें और सकारात्मक रहें। जरूरत पड़ने पर युवाओं को सुझाव जरूर दें, लेकिन उनकी जिंदगी में जबरन दखल देना न सिर्फ उनकी नजरों में हमारी छवि को नकारात्मक बना देता है, बल्कि हमें अपनों से दूर और एकाकी भी कर देता है। ये बात अहम है कि जिंदगी से इश्क़ बाक़ी रहे। अगर ऐसा हो पाए तो उम्र भले साठ की हो या सत्तर की, वह महज़ एक संख्या भर ही रहेगी। 

शरीर भले वृद्ध हो, मन रहे जवान
कवि विलियम बटलर यीट्स कह चुके हैं, 'इस संसार में एक वृद्ध व्यक्ति की कोई जगह नहीं'। ये पंक्ति ऊपर से देखने पर निराशाजनक लगती है, लेकिन सच कुछ और है। यीट्स कहीं न कहीं यही सुझाते हैं कि तन पर भले झुर्रियां हों, लेकिन मन को युवा ही रखना है। हेल्प एज इंडिया के एक सर्वे में 69 फ़ीसदी बुजुर्गों ने निराशा के साथ यही कहा है कि बच्चे उनकी अवहेलना करते हैं, उनकी जरूरतों पर ध्यान नहीं देते हैं। जाहिर है। कि साठ पार करते ही अधिकांश भारतीय निराशा का सामना करने लगते हैं। इन आंकड़ों की रोशनी में आवश्यक है कि जीवन की अरण्य वेला में पहुंचते ही सकारात्मक विचारों का वन और गुलजार कर लिया जाए। इसके लिए जरूरी योजनाओं पर कम उम्र से ही काम शुरू कर देना जरूरी है। ज्यादा उम्र में भी कुछ कर गुजरने का और दुनिया को बदलने का जज्बा बरक़रार रखा जा सकता है। आवश्यक ये है कि जीवन के लिए सकारात्मक नजरिया बनाए रखा जाए। स्वस्थ मन शरीर को भी हौसलामंद बनाए रखता है, जिससे हमारे उत्साह व जिजीविषा में इज़ाफ़ा होता रहता है। साठ के बाद जिंदगी की एक और पारी शुरू होती है, जिसमें हमें और ज्यादा उत्साहित होकर आगे बढ़ने के लिए तत्पर होना होगा। कौन कहता है। कि दूसरी पारी में पहली से ज्यादा रन नहीं बनाए जा सकते?

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