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पेरेंट्स बच्चों को रोकें तो रुकेंगे शहर में हादसे

5 वर्ष पहले
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जीरकपुरमें ट्रैफिक नियमों को तोड़ने वालाें की संख्या काफी ज्यादा है। यहां पुलिस भी पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही है। वजह यह है कि यहां स्कूली बच्चे तक ड्राइविंग करते नजर आते हैं। जिन बच्चों के लाइसेंस तक नहीं बने उनको भी मां-बाप गाड़ी चलाने के लिए दे रहे है। इसलिए भी पुलिस के लिए यहां ट्रैफिक नियमों को तोड़ने वालों को रोकना मुश्किल हो रहा है। पुलिस का कहना है कि हर दिन सड़क पर एक्सिडेंट हो रहे हैं। ये हादसे पूरी तरह से नहीं तो कम किए जा सकते हैं। यह सब तभी संभव है जब सड़क पर चलने वाला हरेक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी निभाए। उन्हें उस उम्र में गाड़ी की चाबी दें जिस उम्र में सरकार उनको लाइसेंस देने का भी पात्र नहीं समझती। यानि की 18 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे को इसके लिए सख्त मनाही होनी चाहिए। नौ सिखिए ड्राइवर खुद के लिए तो मुश्किल खड़ी कर सकता है बल्कि उन लोगों के लिए भी खतरा हैं जो सड़क पर सही तरीके से चलते हैं। इसलिए खुद और बच्चों को इस बात के लिए तैयार करें कि सड़क पर ड्राइविंग नियमों को पूरा करने पर ही करें। पेरेंट्स को चाहिए कि वे 18 साल से पहले बच्चे को गाड़ी चलाने की इजाजत दें। महिमा सिंह का कहना है कि सड़क पर ड्राइविंग करने वाले कई बच्चों को आप देख सकते हैं। इसमें पेरेंट्स की भी कमी है जो बच्चों को गाड़ी की चाबी थमा देते है। बच्चों को तभी गाड़ी की चाबी देनी चाहिए जब उसका ड्राइविंग लाइसेंस बन जाए। 18 साल से कम उम्र के बच्चों को गाड़ी चलाने की परमिशन जब सरकार नहीं दे रही है तो हम अपने बच्चों को क्या गलती शिक्षा दे रहे है। उनको गाड़ी की चाबी तब तक दें जब तक कि लाइसेंस नहीं बन जाता है। सड़क पर अच्छी ड्राइविंग के अलावा एक समझदार व्यक्ति भी चाहिए जो खुद की और लोगांे की जान की सुरक्षा कर सके। वहीं, राजीव का कहना है कि मेरा मानना है कि ट्रैफिक नियमों को हम अभी जरा भी फाॅलो नहीं कर रहे है। सड़क पर उस समय हम नियमों को ध्यान में रखते हैं जब सामने पुलिस खड़ी हो। अगर किसी ट्रैफिक लाइट्स पर पुलिस खड़ी हो तो कम ही लोग वहां रेड लाइट पर रुकते हैं। लोग इधर उधर पुलिस को देखते हैं। अगर पुलिस नहीं होती तो वहां नियम तोड़कर रेड लाइट जम्प करते है। यहां आदत किसी एक की नहीं बल्कि अधिकतर लोगांे की होती है। सुबह के समय जब पुलिस चौराहों या ट्रैफिक लाइट्स पर नहीं होती है उस समय देखा जा सकता है कि हम सब कितने जिम्मेदारी से ड्राइविंग करते हैं। यह गलत है। इस कमी को हम सबको सुधारना है। संतोष का कहना है कि ट्रैफिक नियमों को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए पेरेंट्स या घर के लोगांे का बड़ा योगदान है। बच्चे हमसे ही सब सीखते है। अगर हमारे साथ बच्चे गाड़ी में बैठे हों तो उस समय ट्रैफिक नियमों का जरा भी तोड़े। ऐसे में बच्चे भी हमसे सीखेंगे। इसलिए हरेक पेरेंट्स को चाहिए कि ट्रैफिक नियमों को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए उनके सामने आदर्श बनें। रेड लाइट जंप करें। ओवर स्पीड चलें और रॉन्ग साइड में ड्राइविंग करें। इससे भी बच्चें को कछ कुछ शिक्षा मिलेगी। सड़कों पर लाइसेंस बनने से पहले बच्चों को गाड़ी चलाने के लिए नहीं दी जानी चाहिए।

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