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डाउनलोड करेंबिलासपुर. एट्रोसिटी एक्ट के तहत पकड़े गए बंदी की जेल में मौत हो गई थी। पत्नी ने जेल प्रबंधन पर मारपीट करने, समय पर इलाज नहीं मुहैया करवाने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। हाईकोर्ट ने मृतक के परिजनों को 15 लाख रुपए मुआवजा समेत वाद व्यय के रूप में 25 हजार रुपए देने के आदेश दिए हैं।
जांजगीर में रहने वाले संतोष श्रीवास के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था। पुलिस ने उसे 3 मई 2011 को गिरफ्तार किया था। दो दिन बाद ही 5 मई 2011 को उसकी मौत हो गई। संतोष की पत्नी सरोज श्रीवास ने अधिवक्ता सुमीत सिंह के जरिए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, इसमें जेल प्रबंधन पर मारपीट करने और समय पर इलाज की सुविधा मुहैया नहीं करवाने का आरोप लगाया गया था।
हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य शासन, गृह सचिव, डीजीपी, जांजगीर के एसपी, जेल अधीक्षक सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। मामले पर बुधवार को जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर और जस्टिस संजय अग्रवाल की बेंच में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने जेल में मौत को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए मृतक के परिजनों को 15 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया है। साथ ही डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि जेलों में बंदियों और कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
उनके समय पर इलाज की सुविधा के साथ 24 घंटे डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध करवाने के भी निर्देश दिए गए हैँ। हाईकोर्ट के आदेश का पालन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के भी निर्देश हाईकोर्ट ने दिए हैं।
नसबंदी कांड में आरोपी डॉक्टर की अवमानना याचिका खारिज
उधर, नसबंदी कांड में आरोपी बनाए गए डॉक्टर की अवमानना याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। उन्होंने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका प्रस्तुत कर कहा था कि नियमों के तहत पूर्व अनुमति से अभियोजन के आदेश का पालन नहीं किया गया है। उन्हें पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने को लेकर नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई को हाईकोर्ट के आदेश के तहत अवमानना नहीं मानते हुए याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने फरवरी 2017 में डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर और प्रकरण को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि इसके लिए जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अभियोजन के लिए पूर्व अनुमति लेकर बगैर एफआईआर दर्ज करने के साथ ही प्रकरण शुरू किया गया। साथ ही राज्य शासन को पूर्व अनुमति लेकर अभियोजन की छूट दी गई थी।
बिलासपुर जिले के पेंडारी स्थित हॉस्पिटल में हुए नसबंदी कांड में आरोपी बनाए गए डॉ. रमेश कुमार गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका पेश कर एफआईआर और उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक प्रकरण को निरस्त करने की मांग की थी। फरवरी 2017 को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ अभियोजन के लिए राज्य सरकार से पूर्व अनुमति नहीं लेने के कारण उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और आपराधिक प्रकरण शुरू करने को अनुचित मानते हुए उनके खिलाफ 11 दर्ज एफआईआर और इस आधार पर उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक प्रकरण को निरस्त कर दिया था। साथ ही छूट दी थी कि सरकार चाहे तो नियमानुसार अभियोजन के लिए पूर्व अनुमति प्राप्त करने के साथ ही उनके खिलाफ प्रकरण चला सकती है।
इधर, डॉ. गुप्ता ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका प्रस्तुत कर कहा कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है। सीआरपीसी की धारा 197 के तहत राज्य सरकार से अभियोजन की पूर्व अनुमति लिए बगैर पुलिस ने उन्हें एफआईआर दर्ज करने के लिए नोटिस जारी किया है। जस्टिस पी सैम कोशी की बेंच ने अवमानना याचिका को चलने योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया है।
क्या है मामला
सकरी के पेंडारी स्थित नेमीचंद जैन हॉस्पिटल में 8 नवंबर 2014 को नसबंदी शिविर लगाया गया था। यहां जिला अस्पताल में पदस्थ सर्जिकल स्पेशलिस्ट डॉ. रमेश कुमार गुप्ता ने करीब 90 मिनट में 83 महिलाओं का ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद महिलाओं को सिप्रोसिन और आईब्रूफेन टेबलेट देकर डिस्चार्ज कर दिया गया। घर जाने के कुछ घंटों बाद ही ज्यादातर महिलाओं की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई तो उन्हें जिला अस्पताल, सिम्स और अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान ही कुछ घंटों के भीतर 13 महिलाओं की मौत हो गई। चकरभाठा थाने में डॉ. गुप्ता के खिलाफ 11 नवंबर 2014 को आईपीसी की धारा 304(2), 308/34 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था। उन्हें बलौदा बाजार से गिरफ्तार करने के बाद 13 नवंबर 2014 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। जांच पूरी होने के बाद 15 फरवरी 2015 को बिल्हा के जेएमएफसी कोर्ट में चार्जशीट प्रस्तुत किया गया। बाद में मामले में ट्रायल के लिए सेशन कोर्ट भेज दिया गया। इस बीच आरोपी डॉक्टर को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी।
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