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Bhaskar Analysis: गुजरात ने अपने गौरव को चुना, किन्तु दंभ बनने से रोका

गुजरात ने गज़ब किया। गुजराती गौरव को विजयी बनाया। किन्तु गौरव को अहंकार बनने से रोक लिया।

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Dec 19, 2017, 02:15 AM IST

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    कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।

    गुजरात में यह क्या हुआ?
    - गुजरात ने गज़ब किया। गुजराती गौरव को विजयी बनाया। किन्तु गौरव को अहंकार बनने से रोक लिया।

    सबसे बड़ा फैक्टर क्या रहा?
    - मोदी फैक्टर। पूरी भाजपा, पूरी कांग्रेस, सारे फैक्टर उनसे हल्के रहे।

    सबसे चौंकाने वाली बात?
    - ग्रामीण और शहरी गुजरात का ठीक विपरीत रुझान। शहरों ने मोदी के ‘हूं छू विकास’ को माना। गांवों में राहुल गांधी के ‘विकास पागल हो गया’ नारे पर मोहर लगाई। खेतों-खलिहानों का गुस्सा निकलकर वोटों में दिखा।
    दो करोड़ युवाओं के रुझान भी चौंकाने वाले हैं। आमतौर पर मोदी प्रशंसक माने जाने वाले युवाओं की बड़ी संख्या भी कांग्रेस की ओर चली गई। मूल में बेरोजगारी है।
    तीसरा आश्चर्य है हिंसक जीएसटी आंदोलन के दौरान जहां दमन हुआ, वे सभी सीटें भी भाजपा काे मिलीं। यानी नाराज व्यापारी फिर भाजपा के साथ गए।

    लगातार छठी जीत के मायने क्या?
    - 22 वर्षों से जीत रही भाजपा को पराजय का भय कभी भी नहीं था। किन्तु औसतन 114 से 121 सीटों से गिरकर वह 99 के फेर में आ जाएगी, ऐसा आश्चर्यजनक है। गुजरातियों ने चुना। किन्तु चेतावनी देकर। और कांग्रेस को विकल्प नहीं माना। भाजपा संगठन पर अब मोदी बहुत सख़्त होंगे। क्योंकि छोटी जीत उन्हें स्वीकार्य नहीं है। बड़ी जीत की आदत पड़ चुकी है।

    तो क्या यह कांग्रेस की नैतिक जीत है?
    - ऐसा राहुल गांधी कह रहे हैं। ठीक भी है। पिछले छह चुनावों में 70 से आगे नहीं बढ़ी थी कांग्रेस। किन्तु एक और गहरा बिंदु है। कांग्रेस अब पछता रही होगी कि यह उनके लिए ‘अपॉर्च्युनिटी किल्ड’ जैसा हो गया। जनेऊधारी हिन्दू या ‘नीच राजनीति’ नहीं होती तो कुछ फायदा और हो जाता। जबकि सच्चाई यह है कि साढ़े चार साल निष्क्रिय रहकर पांच साल का चुनाव नहीं जीता जा सकता। एक वोट की भी जीत, जीत ही होती है। नैतिक जीत मात्र ढांढस है। ‘...किन्तु दिल जीते’ का पहला अर्थ ही यह होता है कि मैच हारे।

    हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश से कितना नुकसान हुआ भाजपा को?
    - विशेष नहीं। भाजपा ने इस नौजवान त्रिमूर्ति को ‘हज’ का नाम दिया था। सौराष्ट्र को छोड़कर ये कहीं कुछ नहीं कर पाए। नॉर्थ गुजरात में तो पटेलों ने खुलकर भाजपा को डेढ़ गुना बढ़त दिलाई। वास्तव में कांग्रेस का इन तीन कंधों पर सवार होना उसकी कमज़ोरी बन गई। ‘यूपी के लड़के’ खारिज हुए थे। गुजरात के लड़के भी नहीं चले। अल्पेश का कांग्रेस में शामिल होना ही पटेलों के लिए अलार्मिंग था। क्योंकि आरक्षण क्यों बंटने देंगे ओबीसी? भाजपा ने इन्हें जातिवाद का जहर फैलाने वाले सिद्ध कर दिया। जो कारगर रहा।

    इनका आगे क्या होगा?
    - तीनों शोर मचाना जानते हैं। आक्रामक हैं। राजनीति में खूब बने रहेंगे।

    सौराष्ट्र में भाजपा को धक्का क्यों पहुंचा?
    - सौराष्ट्र में भाजपा को इतनी कम सीटों का कारण रहा किसानों का गुस्सा। किसान+पटेल भाजपा को तोड़ गए। जबकि नॉर्थ गुजरात के गैर-किसान+पटेल भाजपा को बढ़त दिला गए। बची कमी भाजपा ने कांग्रेसी आदिवासी वोटों में पैठ कर पूरी की।

    हिमाचल, गुजरात से आगे क्या?
    - इन दो जीतों ने भाजपा को अपराजेय पार्टी बना दिया है। किन्तु अगले वर्ष चुनाव में कर्नाटक जीतने और मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान को फिर पाने के लिए उसे नए सिरे से काम करना होगा। क्योंकि वोटों का अंतर घटता जा रहा है। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में एक बेचैनी हर तरफ दिख रही है। बड़ा अवसर राहुल गांधी के पास होगा। क्योंकि उनके पास खोने को मात्र कर्नाटक और पाने को चारों राज्य होंगे।
    विपक्ष एकजुट होगा इसमें संदेह है। किन्तु 2019 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी दलों के लिए कोई चारा भी नहीं है।

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