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कल्पेश याग्निक का कॉलम : खून से लथपथ बच्चों ने कुछ तो सोचा होगा

कोई भी मार डालता है हमारे बच्चों को। केवल माध्यम बदल जाते हैं। आज स्कूल बस में। बीते कल अस्पताल में।

Danik Bhaskar | Jan 06, 2018, 01:55 AM IST
कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं। कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।

‘सन्नाटा सबसे अधिक डरावनी चीख है।’ -अज्ञात

उन बच्चों की बंद होती आंखों ने कुछ तो देखा होगा?
मृत्यु।
या कि जीवन छीन लेेने वाले क्रूर, कर्तव्यविमुख मनुष्य?
रक्त से लथपथ नन्हें कानों ने कुछ तो सुना होगा?
चीख।
या कि किसी की न सुनने वाले दैत्याकार वाहनों की भीषण भिड़ंत?
जिस नाक ने अभी तीखा या गोलमटोल आकार लेेने के पहले ही अंतिम सांस ले ली, उसने कुछ तो सूंघा होगा?
टूटे-बिखरे टिफिन से मां की सौंधी खुशबू।
या कि घर के बाहर पुचकारने, ध्यान रखने, संभालने के झूठे वादे करने वालों की लापरवाही की सड़ांध?
हमारे लिए, हम सब के लिए भविष्य में एक सुंदर संसार का निर्माण करने वाले मुलायम या गठीले हाथों ने कुछ तो स्पर्श किया हाेगा?
पास गिरी अपनी सहेली की लहूलुहान चोटी, जो बड़ी मुश्किल से गूंथी गई थी। या कि हम सभी की खुरदुरी विवशता? पथरीली निष्ठुरता?
क्योंकि हम कुछ नहीं कर पाए।
नहीं ही कर पाए।
कोई भी मार डालता है हमारे बच्चों को।
केवल माध्यम बदल जाते हैं।
आज स्कूल बस में।
बीते कल अस्पताल में। ऑक्सीजन समाप्त होने से। उससे पहले मध्याह्न भोजन से। और अपराधियों से तो प्रतिदिन।
जबकि, सभी जानते हैं
संसार में सर्वाधिक दारुण दुख यही है
माता-पिता के सामने बच्चों का यूं चले जाना।
हूक। टीस। फांस। सांस
सब कुछ समाप्त हो जाता है।
नहीं समाप्त होता तो कर्णधारों का सोना।
नहीं रुकती तो रखवालों की स्वेच्छाचारिता।
नहीं टूटती तो जड़ता।
कितना अंधेर है। कितनी कुंठा है।
कि हमारे बच्चे कभी भी, कहीं भी मृत्यु के सामने फेंक दिए जाएं और हम केवल रोते रह जाएं।
कितनी दुर्बलता है। कितने अक्षम हम। जिन्हें, "अपने पैरों पर खड़ा रहने' की शिक्षा देने हम घर
से बाहर भेजें, उनका ऐसा हृदयविदारक समाचार मिले कि पैरों तले धरती खिसक जाए।
आकाश फट पड़े। किन्तु दोषी, आततायी, हत्यारे कभी रसातल में न जाएं।
वास्तव में दोषी हम हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य हमारे बच्चे ही तो हैं।
उन्हें ही छीन लिया जाए तो अब यह जीना कैसा?
किन्तु रुकना होगा।
जीना होगा।
हमने खोया। आप न खोएं।
आज इस दुख से केवल अपने ही नहीं रो रहे हैं।
पराई आंखें भी अश्रुपूरित हैं।
मां, मां ही होती है।
तुम्हारी हो या मेरी।
हर बच्चे की विदाई पर रोती है
याद है न पाकिस्तानी बच्चों को गोलियों से उड़ा देने वाली घटना पर वो वज्र सी हो गई थी।
पथरा गई थीं आंखें। सूख गया था मुख।
क्योंकि
वो हर बच्चे की चीख में अपने बच्चे को सुनती है।
पिता कौनसे अलग हैं?
बार-बार बच्ची के कमरे में किसे देखने जाते हैं?
या बाहर भेजने के बाद कभी उस कमरे में जाते ही नहीं?
कठोर बने रहना पिता की जिम्मेदारी है। नियति है।
अन्यथा संसार थम जाए।
आज थमना नहीं है।
दुख यदि तोड़ सकता है तो दृढ़ता भी पैदा कर सकता है।
संताप, संदेश दे सकता है।
एक बार फूट-फूट कर रो लेने दो।
कलेजा फट पड़ेगा।
फिर भी मन हल्का ना होगा।
करना भी नहीं है।
किन्तु कल तक उस मासूम पर मरते थे, तो आज से उसी के लिए जीना होगा।
उसके भाई-बहन-मित्र-संगिनी
चारों ओर फैले हुए हैं
कई रूपों में। कई नामों से। कई शहरों में।
कुछ तो स्वयं चले गए, किन्तु दूसरों को जाने से रोक गए।
कई शरीरों में जीवित रह रहे हैं।
बाकी सो गए।
किन्तु हमें जगा कर।
हम अभागे। लाचार। अशक्त।
पूरी तरह जागते तो हैं
किन्तु फिर से सो जाते हैं।
हमारा क्रन्दन, क्रांति कब बनेगा?
एक बार, केवल एक पल के लिए उस घर में स्वयं को रखकर देखिएगा।
एक पल, एक शताब्दी जैसा लंबा हो जाएगा।
एक आंसू, एक समुद्र जैसा गहरा लगेगा।
तब आप जानेंगे
कि ड्राइवर होने का अर्थ क्या है?
डॉक्टर होने का धर्म क्या है?
प्रिंसिपल होने का कर्तव्य क्या है?
स्कूल खोलने से कौन-कौन से दायित्व
बताए-कहे बग़ैर आते हैं?
पुलिस होने के मायने, प्रशासन चलाने के कायदे, सरकार होने का राजधर्म अंतत: होता क्या है?
और पत्रकार होने पर जागरुकता कितनी अनिवार्य है?
हमेशा आंखें खुली रखनी हैं।
निश्चित ही इन सभी की सर्वोच्च प्राथमिकता आज स्वयं का बचाव करना बन गई होगी/है/रहेगी।
भ्रष्ट आचरण से भी निकृष्ट है ऐसी सोच।
निर्लज्जता है।
प्रत्येक आपराधिक लापरवाही के पश्चात ये और इनके जैसे सभी घृणित रक्षा-कवच में छुप जाते हैं।
क्याेंकि वे मरना नहीं चाहते।
क्या मारना चाहते हैं?
क्या पशुवत नरभक्षी हैं?
कतई नहीं।
तो पाप का प्रायश्चित क्यों नहीं करते?
मेरी किसी भी भूल से एक हंसता-खेलता बच्चा, जान गंवा दे!
कैसे सहन हो सकता है?
इस पहाड़ से अपराध-बोध को सीने में लिए जी कैसे पाते होंगे?
बच्चों ने ही संसार को पवित्र, निर्मल, निश्छल, कोमल आौर प्रसन्नता से भरा बना रखा है। बच्चों के कारण ही जीवन में "आशा" है। अन्यथा नैराश्य में डूबा होता समूचा विश्व।
बच्चों की ऐसी मृत्यु हमें स्वीकार्य नहीं है।
नन्हें जीवन की हत्या, हादसे, अकाल मृत्यु रुक सके, असंभव है। किन्तु रोकनी ही होंगी।
कठोर अनुशासन से इन पर रोक लग सकती है।
और इस अनुशासन का समर्पित होकर पालन उन्हीं कर्णधारों को करना होगा-जिन पर विभिन्न प्रकार के अनुशासन औरों पर लागू करने की जिम्मेदारी है।
यदि प्रत्येक नियम का पालन हो, तो अनमोल जीवन जीवंत हो धड़केंगे। यदि बच्चों को सच्चा प्यार, इन बच्चों को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है, तो उठिए- स्वयं नियमों का पालन कीजिए और किसी को नियम तोड़ने मत दीजिए।
वे बच्चे देंगे आपको साहस।
आपके बच्चे।
उन शिथिल पड़ते बच्चों ने कुछ तो सोचा होगा।
-मम्मी, रोना मत। मैं फिर लौटूंगी/लौटूंगा।
सच है।


(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

कल्पेश याग्निक। कल्पेश याग्निक।