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बदलाव जो शिक्षा, सेहत की तस्वीर बदल देगा

डेढ़ दशक के दौरान भारत में निजी स्तर पर दान में छह गुना बढ़ोतरी ने देश के धनी वर्ग के बारे में कई धारणाएं तोड़ीं

bhaskar News | Last Modified - Feb 09, 2018, 05:01 AM IST

  • बदलाव जो शिक्षा, सेहत की तस्वीर बदल देगा
    गुरचरण दास स्तंभकार एवं लेखक

    वर्ष 1960 में हुई दो घटनाओं का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब मैं 17 वर्ष का था तो मुझे अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अंडरग्रेजुएट स्कॉलरशिप मिली। मैं वहां सिर्फ इसलिए जा पाया, क्योंकि एक अज्ञात अमेरिकी परिवार ने स्कॉलरशिप का पैसा दिया। मुझे कभी उस परिवार का पता नहीं चला। मैं जब विदेश में पढ़ रहा था तो मुझे शर्म आती थी, क्योंकि अखबार भारत को ‘बास्केट केस’ कहते थे। सूखे के वर्षों में अमेरिका से अनाज से लदा जहाज ‘हर दस मिनट’ में भारतीय बंदरगाह पर पहुंचता था ताकि भारतीयों को भूखों मरने से बचाया जा सके। लेकिन, जल्द ही परिस्थिति दर्शनीय रूप से बदल गई। अमेरिकी वैज्ञानिक नारमन बोरलॉग ने मैक्सिको के रिसर्च सेंटर में गेहूं की एक चमत्कारी संकर किस्म खोजने में भूमिका निभाई। इस रिसर्च सेंटर में रॉकफेलर फाउंडेशन ने फंडिंग की थी। इस खोज ने भारत में ‘हरित क्रांति’ लाने में मदद की। इसका श्रेय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के कृषि मंत्री सी. सुब्रह्मण्यम को भी है, जिन्होंने तत्काल दो हवाई जहाज भरकर इस चमत्कारी बीज का ऑर्डर दिया और उन्हें पंजाब में बोया गया।


    इन दो घटनाओं को जो जोड़ता है वह है निजी स्तर पर अमेरिकी परोपकार की परम्परा। व्यक्तिगत स्तर पर एक अज्ञात दानदाता ने यह संभव बनाया कि मैं दुनिया की श्रेष्ठतम शिक्षा हासिल करूं। राष्ट्रीय स्तर पर रॉकफेलर की परोपकारिता ने ऐसी वैज्ञानिक सफलता दिलाई, जिसने भारत को समृद्धि दिलाई। इन दो कहानियों को याद करने का मेरा उद्देश्य यह बताना है कि ऐसा ही कुछ इन दिनों भारत में हो रहा है- परोपकार के क्षेत्र में मौन क्रांति। प्रतिष्ठित बैन/दसरा इंडिया फिलैंथ्रॉपी रिपोर्ट 2017 के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में विदेशी दान या कॉर्पोरेट दान अथवा सरकारी कल्याण कार्यक्रमों में फंडिंग की तुलना में व्यक्तिगत स्तर पर निजी दान अधिक तेजी से बढ़ा है। यह 2001 में 6000 करोड़ से छह गुना बढ़कर 2016 में 36,000 करोड़ रुपए हो गया। सरकार अब भी कल्याणकारी कार्यक्रमों पर 1,50,000 करोड़ रुपए खर्च करके सबसे अधिक योगदान दे रही है लेकिन, यदि यही ट्रेंड जारी रहता है तो निजी स्तर पर होने वाली परोपकारिता भविष्य में शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार लाने और गरीबी मिटाने में महत्वपूर्ण भू्िमका निभाएगी।


    इससे यह धारणा खारिज होती है कि धनी भारतीय व्यवसायी चैरिटेबल नहीं हैं- जब वे पैसे देते भी हैं तो मंदिरों में ईश्वर को खुश करने के लिए। हमें यह याद रखना होगा कि 1991 में 97 फीसदी टैक्स रेट वाला ‘लाइसेंस राज’ जाने के बाद भारतीयों ने गंभीरता से संपदा इकट्ठा करना शुरू किया। आमतौर पर पहली पीढ़ी पैसा कमाती है और उसका दिखावा करती है जैसे लक्ष्मी मित्तल ने फ्रांस में अपनी बेटी की मशहूर शादी के अवसर पर किया। दूसरी पीढ़ी को पैसे की नहीं, सत्ता की कामना होती है, इसीलिए केनेडी और रॉकफेलर राजनीति में आए। पैसे तथा सत्ता में जन्मी तीसरी पीढ़ी सम्मान चाहती है और खुद को परोपकार तथा कलाओं के प्रति समर्पित कर देती है। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के ‘रॉबर बैरॉन युग’ (अनैतिक व एकाधिकार वादी तरीकों से खूब पैसा इकट्ठा करने वाले और जबर्दस्त राजनीतिक प्रभाव वाले बिज़नेसमैन) में भी स्टील किंग एंड्रयू कारनेगी ने अपनी 90 फीसदी संपत्ति अमेरिकी शहरों में सार्वजनिक लाइब्रेरी स्थापित करने के लिए दे दी। उनका यह कथन मशहूर है, ‘जो धनी होकर मरता है, वह अपमानित होकर मरता है।’


    जिस तरह ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में संपदा उत्पन्न करने का चक्र छोटा हो गया है, चक फीनी से प्रेरित बिल गेट्स ने तीन पीढ़ियों का चक्र तोड़ दिया और अपने ही जीवन में पैसा दे दिया। वारेन बफे ने भी यही किया। गेट्स अपने ‘गिविंग प्लेज’ (देने के संकल्प) से दुनियाभर के युवा आंत्रप्रेन्योर को अपने ही जीवनकाल में आधी संपत्ति देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने अजीम प्रेमजी, नंदन नीलेकणि, शिव नादर, सुनील मित्तल, अाशीष धवन और कई उदार लोगों को प्रेरित किया है। धवन के मामले में इसका नतीजा विश्वस्तरीय लिबरल आर्ट्स यूनिवर्सिटी की रचना में हुआ, जिसके उनकी जैसी सोच वाले कई संस्थापक हैं। यदि आपको अशोका में प्रवेश मिल जाए तो आपको किसी अज्ञात दानदाता से स्कॉलरशिप मिलना तय है। नादर भी विश्वस्तरीय संग्रहालय बना रहे हैं।


    पंचतंत्र की शुरुआत में ही एक बहुत अच्छी कहानी है जो बताती है कि एक अधिक उम्र का व्यापारी युवा व्यापारी को सलाह देता है कि सफल जीवन के लिए चार हुनर चाहिए। एक, वह कहता है तुम्हें पैसा कमाना सीखना चाहिए। दो, फिर इसे संरक्षित रखना सीखना होगा- इसे कालीन के नीचे छिपाइए मत बल्कि इस पर ब्याज कमाकर इसे बढ़ाइए। तीन, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि इसे कैसे खर्च करें- कंजूस न बनें तो शाहखर्च होने से भी बचें। आखिर में, इसे देना सीखो।


    बहुत धनी लोगों की भी अपनी समस्या होती है। वे अपने बच्चों को इतना पैसा देना चाहते हैं कि वे उनमें जिस भी चीज के लिए जुनून हो, उसे वे सीख सकें पर वे इतना नहीं देना चाहते कि वे कुछ भी करें ही नहीं। अमेरिका के सबसे धनी परिवारों में से एक के बेटे जॉन डी. रॉकफेलर ने कहा है, ‘मुझे शुरुआत से ही काम करने, पैसा बचाने और दान देने का प्रशिक्षण मिला।’ भारत मानव विकास सूचकांक पर 130वें स्थान पर होने से धनी भारतीय गरीबों की ज़िंदगी में सुधार लाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। वे कभी सरकार की जगह नहीं ले सकते। किंतु बुद्धिमत्तापूर्वक श्रेष्ठतम एनजीओ को देकर और यह सुनिश्चित करके कि एनजीओ पैसे का ठीक से उपयोग करें, वे बहुत बड़ा फर्क ला सकते हैं। कई कंपनियां मूल्यवान काम करने में सीएसआर लॉ (जिसके तहत कंपनी को 50 फीसदी फंड डेवलपमेंट चैरिटी को देना होता है) का इस्तेमाल कर रही हैं। इसमें सबसे अच्छा यह है कि वे अपने कर्मचारियों को हफ्ते के कुछ घंटे एनजीओ को कोई कौशल सिखाने के लिए देने को कहती हैं ताकि उनका चैरिटेबल योगदान अधिक असरदार हो सके। आप इसे कुछ भी कहें- परोपकार, चैरिटी, स्वेच्छा दान लेकिन भारतीय इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं, जो वाकई अमेरिकी परम्परा का मुकुट-मणि है।

    (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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