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यदि मुख्य सचिव ही सुरक्षित नहीं तो फिर कौन है?

कभी ब्यूरोक्रेट रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने ही शीर्ष अधिकारी की रक्षा नहीं कर पाए।

अमन सिंह | Last Modified - Feb 23, 2018, 07:46 AM IST

यदि मुख्य सचिव ही सुरक्षित नहीं तो फिर कौन है?

‘राजनीति में कुछ भी संयोगवश नहीं होता, यदि यह होता है तो आप शर्त लगा सकते हैं कि इसकी योजना ही उस तरह बनाई गई थी।’ एक कोट में यह कहा गया है, जो व्यापक रूप से रूजवेल्ट का बताया जाता है। दिल्ली में 20 फरवरी की रात जो पटकथा सामने आई वह सुनियोजित प्रतीत होती है। लगता है मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को जाल बिछाकर मुख्यमंत्री निवास पर बुलाया गया, ऐसी जगह जहां जाने से वे इनकार नहीं कर सकते थे। अपने ही विधायकों के दबाव में मुख्यमंत्री ने उनका सीधे सामना करने के लिए मुख्य सचिव को बुला लिया। लेकिन, इसके बाद पटकथा गड़बड़ होकर मुख्य पात्र के काबू से बाहर चली गई। यह कोई गोपनीय रहस्य नहीं है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मीडिया और अपने सार्वजनिक भाषणों के माध्यम से भ्रष्टों को जाल में फंसाने की वकालत करते रहे हैं- अपने मोबाइल से वीडियो शूट करो और भ्रष्टों को कटघरे में खड़ा कर दो। भ्रष्टाचार रोकने में इसकी उपयोगिता जो भी रही हो, यह संदेश लुप्त नहीं हुआ है। इस अजीब से प्रकरण से देशभर में संदेश गया है कि जब अन्य निर्वाचित विधायकों के साथ खुद मुख्यमंत्री ऐसे हथकंडों पर उतर सकता है, फिर तो यह खुला खेल ही हो गया है।


संपूर्णता में देखें तो यह दुखद घटना इतने बरसों में हुए घटनाक्रमों का चरमोत्कर्ष है। बिहार में नौकरशाहों के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार का लंबा इतिहास है लेकिन, हम अपवाद मानकर इसकी अनदेखी कर देते हैं। 1993 में गोपालगंज के डीएम की राजनीतिक भीड़ ने क्रूरतापूर्ण हत्या की थी और पिछले ही साल सारण के डीएम की एक राजनीतिक दल के लोगों ने रॉड से पिटाई की थी। अभी हाल में मध्यप्रदेश के मंदसौर में भीड़ ने जिला कलेक्टर और एसपी की पिटाई कर दी थी। वहां राज्य अपने अफसरों को संरक्षण नहीं दे सका बल्कि उनका तबादला करना बेहतर समझा गया। और पीछे जाएं तो ओड़िशा के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने पूरे राज्य को सलाह दी थी कि जो बाबू न माने उसे चांटा मार दिया जाए, जिसका अंतत: यह नतीजा हुआ कि एक बेरोजगार युवक ने उनकी सलाह पर चलते हुए उन्हें ही थप्पड़ मार दिया। मैं यहां यह रेखांकित करना चाहता हूं कि राज्य की इमारत ब्यूरोक्रेसी और निर्वाचित नेतृत्व की नींव पर निर्भर है। एक के द्वारा दूसरे को जान-बूझकर कमजोर करने से पूरी इमारत का अस्थिर होना तय है और अब यह देश की राजनीति में निकृष्टतम स्तर पर पहुंच गया है।


यहां हम नौकरशाही की प्रतिक्रिया पर अाते हैं। चूंकि मामले की तपिश शीर्ष तक पहंुंची तो ढेर सारी अधीनस्थ सेवाअों के संघों सहित आईएएस एसोसिएशन एकजुट हो गया। इसी प्रकार की परिस्थितियों में क्या वे किसी तहसीलदार का बचाव करते? कई दशकों से पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम, डॉक्टर और टीचर को थप्पड़ मारे गए हैं, हमले हुए हैं और उन्हें अपमानित किया गया है पर नौकरशाही के शीर्ष स्तर पर उनके हश्र की पूरी तरह अनदेखी की गई। यदि तब अधीनस्थ अधिकारियों के लिए विरोध की गदा उठाई गई होती तो मामला इस हद तक नहीं पहुंचता। व्यक्तिगत स्तर पर मैं कभी यूनियनवाद के पक्ष में नहीं रहा, क्योंकि यदि ब्यूरोक्रेसी को ही यूनियनवाद पर उतरना पड़े तो फिर यह तो उस सब के विपरीत ही होगा, जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन, इसका उलटा भी उतना ही सच है। आवेश में हिंसक हो गए राजनीतिक अधिकारी के सामने एक मामूली ‘बाबू’ क्या कर सकता है? उसके सामने यूनियन के रूप में एकजुट होने के अलावा विकल्प नहीं है। यदि प्रशासनिक नींव को बचाने का यही तरीका है तो यही सही। अन्य सेवाओं के अधिकारी अब यदि घिरे हुए मुख्य सचिव के साथ नहीं खड़े होते हैं तो वे भी उसी जाल में फंस जाएंगे। यदि किसी राज्य का मुख्य सचिव ही सुरक्षित नहीं है तो फिर कौन है?


ब्यूरोक्रेसी के लिए यह आत्मपरीक्षण का वक्त है। इस बात पर यकीन करने वाले कई लोग हैं कि मुख्य सचिव गलत तथ्य गढ़ रहे थे। फर्जी खबरों के इस युग में भी आज ब्यूरोक्रेसी के लिए ज्यादा सम्मान न होने का यह दुखद प्रतीक है और मोटेतौर पर इसके लिए नौकरशाह ही जिम्मेदार हैं। अफसरों के एक अच्छे-खासे वर्ग में भ्रष्टाचार, छल-कपट, कदाचार, अत्यधिक उदासीनता के साथ दंभ व अहंकार ने उस सम्मान, विश्वसनीयता और अधिकार का हनन किया है, जो कभी सिविल सेवा के साथ जुड़ा हुआ था।


खुद कभी ब्यूरोक्रेट रहे मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए तो यह उनकी ज़िंदगी का दुखदतम दिन होना चाहिए, क्योंकि जिस देश में अतिथि की पूजा की जाती है वहां वे अपने अतिथि की अपने घर में अपनी ही पार्टी के लोगों से रक्षा नहीं कर पाए। नैतिकता का बोध रखने वाला कोई भी आत्माभिमानी व्यक्ति न सिर्फ मुख्यमंत्री बल्कि मेजबान के रूप में अपनी जिम्मेदारी न निभा पाने पर पद छोड़ देगा। खेद है कि हमारे देश के सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा के मानक कुछ समय से गिरते ही जा रहे हैं। अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए हम कैसे लोगों को चुन रहे हैं यह जाहिर है। हमारे लोकतंत्र को दीमक खोखला कर रही है और इसके पहले की अधिक नुकसान हो और घर बचाने में बहुत देर हो जाए हमें सक्रिय होना होगा। अाइए, इस बार हम नाकाम न रहें।


यदि केजरीवाल को मुख्य सचिव से वाकई कोई समस्या है तो कई लोकतांत्रिक व सभ्य तरीके उपलब्ध हैं, फिर चाहे दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में एक आईएएस अधिकारी को नियंत्रित करने की गुंजाइश कितनी ही कम क्यों न हो। विडंबना यह है कि कार्यपालिका के भीतर से ध्वस्त होने का अनजाने में ही नतीजा सिविल अथॉरिटी के पतन में हुआ है और न्याय के अंतिम उपाय के रूप में पुलिस का इस अधिकार में प्रवेश हो गया है। यदि मुख्य सचिव असुरक्षित महसूस करें और पुलिस में शिकायत दर्ज करें और फिर विधायक व मंत्री विरोधी शिकायतें दर्ज कराएं, जैसा कि हो रहा है तो सारे लोकतंत्रों द्वारा इतने परिश्रम से नागरिक प्रशासन के पक्ष में स्थापित सत्ता का संतुलन बिगड़ जाएगा। जब एलजी (उपराज्यपाल) दिल्ली विधानसभा में आएंगे तो क्या अब हम विधायकों से उनकी रक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा मांगेंगे? तब हम क्या उत्तर कोरिया या म्यांमार से अलग हैं?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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