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बजट में घोषित किसान का मुनाफा कहां है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य में कीटनाशक व उर्वरक से लेकर भंडारण व परिवहन की लागत भी जोड़नी होगी।

Bhaskar News | Last Modified - Feb 17, 2018, 05:06 AM IST

बजट में घोषित किसान का मुनाफा कहां है?

कुछ साल पहले मैंने 45 वर्ष की अवधि यानी 1970 से 2015 के बीच उपज के खरीद मूल्यों की वृद्धि की तुलना विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारियों की आमदनी में वद्धि से की थी। उद्देश्य था आय के मामले में विभिन्न क्षेत्रों के बीच समानता का पता लगाना। नतीजे चौंकाने वाले थे। 1970 में गेहूं का खरीद मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था, जबकि 2015 में यह 1,450 रुपए प्रति क्विंटल था यानी करीब 19 फीसदी वृद्धि। इसी अवधि में केंद्रीय कर्मचारी का औसत वेतन तथा महंगाई भत्ता 110 से 120 गुना, शिक्षकों का 280 से 320 और कॉलेज/यूनिवर्सिटी शिक्षकों का 150 से 170 गुना बढ़ा। कॉर्पोरेट सेक्टर में मध्य व उच्च स्तर पर कर्मचारियों की आय में 350 से 1000 गुना वृद्धि हुई है। मजे की बात है कि जहां राज्य सरकार के कर्मचारी अथवा कॉलेज प्रोफेसर के मूल वेतन पर महंगाई भत्ते में ही पिछले 10 वर्षों में 137 फीसदी वृद्धि हुई है, किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना अब भी खोखला वादा बना हुआ है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 का बजट पेश करते हुए चौंकाने वाला खुलासा किया कि सरकार ज्यादातर रबी फसलों पर लागत के ऊपर 50 फीसदी मुनाफा दे चुके हैं और वह इसेे खरीफ के मौसम में भी जारी रखेगी। यह सुनकर तो मैं धक्क रह गया। न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा 50 फीसदी मुनाफे की किसानों की मांग स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश पर आधारित है। वित्त मंत्री ने जो घोषणा कि वह किसान को आई वास्तविक कार्यशील लागत (ए2) और कृषक परिवार द्वारा किया गए पारिवारिक श्रम (एफएल) की लागत पर अाधारित है। यह उससे बहुत कम है, जिसकी किसान मांग करते रहे हैं। मुझे अचरज है कि नीति-निर्माता क्यों ऐसा सोचते हैं कि महंगाई की मार किसानों पर नहीं पड़ती। मसलन, स्कूलों की फीस पिछले चार दशकों में 300 गुना बढ़ चुकी है, मेडिकल खर्च 400 से 500 गुना बढ़ा है। फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसान ही ऐसा शक्स है, जो थोक मूल्य पर बेचता है और सबकुछ खुदरा मूल्य पर खरीदता है।
गेहूं की ही बात करें तो इस साल इसकी सरकारी खरीद का मूल्य 1,735 प्रति क्विंटल है। जिसकी ए2 व एफएल लागत यानी उर्वरक, कीटनाशक, मशीनरी, बीज आदि पर खर्च और फिर इसमें परिवार के श्रम की लागत जोड़े तो यह राशि 817 रुपए प्रति क्विंटल आती है। सरकार बहुत सुविधाजनक रूप से ए2 व एफएल को मूल लागत मानकर यह दावा कर रही है कि इस पर वह अंतिम न्यूनतम समर्थन पर 112 फीसदी मुनाफा दे रही है। यह कोई बड़ी बात नहीं है। इससे ज्यादा तो यूपीए सरकार देती रही है। 2009-10 और 2011-12 के बीच गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 125 फीसदी अधिक है, जबकि जौ 110 और चना 105 फीसदी अधिक था। दूसरे शब्दों में किसानों को बहुत चतुराई से धोखा दिया जा रहा है कि सरकार ने तो स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुरूप उपज की कीमत देना शुरू कर दिया है। वैसे भी गेहूं के मामले में सी2 लागत 1,256 पड़ती है। इससे तुलना करें तो अंतिम 1,735 रुपए का एमएसपी अब भी किसानों की एमएसपी तथा 149 रुपए प्रति क्विंटल के 50 फीसदी मुनाफे की मांग से कम है। इसी तरह चने के मामले में ए2 प्लस एफएल लागत 2,461 रुपए पड़ती है और सी2 लागत 3,526 प्रति क्विंटल आती है, जबकि एमएसपी 4,400 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया है। चने के मामले में सी2 तथा 50 फीसदी मुनाफा होगा 5,289 प्रति क्विंटल और न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में किसान को जो मिल रहा है वह 4,400 रुपए प्रति क्विंटल होता है यानी प्रति क्विंटल 889 रुपए की कमी, इसलिए किसानों का यह कहना सही है कि उपज लेने की लागत पर जिस 50 फीसदी मुनाफे की बात की गई है वह कहां है। यहां तक कि अब भी चने की कीमतें 3,200 रुपए प्रति क्विंटल चल रही हैं, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,400 रुपए प्रति क्विंटल है।
लेकिन लागत इस तरह नहीं निकाली जाती। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक कुल कृषि लागत में जमीन की रेंटल वैल्यू और किसान की संपत्ति पर ब्याज को भी जोड़ा जाता है। यह सी2 लागत की श्रेणी में आता है। इसी की मांग तो किसान कर रहे हैं। इसके अलावा मार्केटिंग, वेयरहाउसिंग, ट्रांसपोर्टेशन आदि की लागत को भी सी2 लागत में जोड़ना चाहिए। इसमें 15 फीसदी की अतिरिक्त प्रबंधकीय लागत भी जोड़ें और व्यापक लागत होगी सी3। न्यूनतम समर्थन मूल्य संबंधी सिफारिश सी3 पर आधारित होनी चाहिए। ज्यादातर मामलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य सी3 से कम है, इसलिए मैं पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की इस बात से सहमत हूं कि कृषि मूल्य निकालने में कास्ट अकाउंटेन्ट्स की सेवाएं लेनी चाहिए। मुझे तो यह शिद्दत से लगता है कि अब वक्त आ गया है कि एमएसपी घोषित करने वाले कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) का नेतृत्व कास्ट अकाउंटेन्ट्स को करना चाहिए।
ध्यान में लें कि किस तरह कास्ट अकाउंटेन्ट्स औद्योगिक सामान की कीमत तय करते हैं। जहां किसान आलू सड़कों पर फेंक रहे हैं और कोल्ड स्टोर के मालिक के लिए भी वहां रखे आलू ठिकाने लगाना कठिन हो रहा है, कुछ लोकप्रिय ब्रैंड जिनमें 52 ग्राम से ज्यादा आलू के चिप्स नहीं होते, उनकी कीमत 20 रुपए प्रति पैक है। यानी एक किलो आलू चिप्स को प्रोसेस करके 400 रुपए में बेचा जा रहा है। वरिष्ठ कास्ट अकाउंटेन्ट्स ने मुझे बताया कि प्रोसेसिंग की वास्तविक लागत प्रोडक्ट की अंतिम कीमत के अंश मात्र के बराबर है। प्रोसेस किया फूड, दवाइयां अथवा आॅटोमोबाइल जैसे औद्योगिक उत्पाद हो रिटेल कीमत में अत्यधिक मुनाफा होता है, जो 300 से 500 गुना तक जाता है।
कीमतों का ढांचा ऐसा है कि किसानों को उनकी वाजिब आमदनी से वंचित रखा जाए। मेरा सुझाव है कि अब मूल्य नीति से हटकर आमदनी नीति पर आना चाहिए। वक्त आ गया है कि किसान आमदनी आयोग गठित किया जाए और उसे वह न्यूनतम सुनिश्चित आय निकालने को कहा जाए, जो किसी कृषक परिवार को मिलना ही चाहिए। यह इसलिए भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि केवल 6 फीसदी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है। और बाजार पर निर्भर शेष 94 फीसदी का निर्दयता से शोषण हुआ है। यदि बाजार व्यवस्था कारगर होती तो इतने वर्षों में खेती का संकट और नहीं गहराता।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

देविंदर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ और पर्यावरणविद

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