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जॉब पैदा करने हैं तो ये तीन सुधार करने होंगे

नई पीढ़ी को उचित रोजगार नहीं दे सके तो राष्ट्र के रूप में हमारी यह सबसे बड़ी नाकामी होगी।

Danik Bhaskar | Mar 28, 2018, 11:24 PM IST
चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन् चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन्

भारत में रोजगार की स्थिति पर मेरे अकाउंट से किए ट्विटर सर्वे (वैज्ञानिक नहीं, अनौपचारिक इसलिए हमेशा की तरह शर्तें लागू) में 20 हजार से ज्यादा लोगों ने भाग लिया। दो प्रश्न पूछे गए। एक, किसी औसत ग्रेजुएट के लिए जॉब हासिल करना कितना कठिन है? 87 फीसदी ने इसे कठिन से लेकर बहुत कठिन बताया। यदि कॉलेज ग्रेजुएट की यह हालत है तो इससे कम योग्यता वालों का क्या हाल होगा।
दूसरा प्रश्न था, ‘किसी औसत ग्रेजुएट का शुरुआती अपेक्षित वेतन क्या है?’ करीब 61 फीसदी ग्रेजुएट ने जवाब दिया कि उन्हें प्रतिमाह 5 से 15 हजार रुपए वेतन की अपेक्षा है। ट्विटर पर अंग्रेजी में किए सर्वे के ये नतीजे हैं, जिनका जवाब तुलनात्मक रूप से अधिक परिष्कृत वर्ग ने दिया है। स्थिति खतरनाक है। मैकिंजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब 2013-15 में भारत का जीडीपी 7 फीसदी सालाना दर से बढ़ रहा था, तब भी रोजगार वृद्धि सिर्फ 1.7 फीसदी सालाना थी। मसलन, कानपुर नगर निगम में 3,275 सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए 7 लाख आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 5 लाख ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट थे। पिछले माह ग्रुप सी और डी या निचले दर्जे के 1 लाख जॉब के लिए रेलवे को 2 करोड़ आवेदन प्राप्त हुए। देशभर में यात्रा के दौरान मैं देखता हूं कि कई युवा उचित रोजगार की तलाश में भटकते रहते हैं। बहुत सारे शिक्षित युवा माता-पिता के साथ ही रहते हैं व अपना दिन स्मार्टफोन पर यूट्यूब वीडियो देखकर, सोशल नेटवर्क पर बतियाकर बिताते हैं। उन्हें ऐसे जॉब की हसरत होती है, जो हैं ही नहीं। सरकार चाहे जो सोचती हो पर वे सिर्फ ‘पकोड़ावाला’ बनकर खुश होने को राजी नहीं हैं। मीडिया, विज्ञापनदाताओं, इंटरनेट तक पहुंच और राजनेताओं द्वारा किए गए अतिशयोक्तिपूर्ण चुनावी वादों ने युवाओं में विशाल, अपूर्ण अपेक्षाएं पैदा कर दी हैं। पहले मोहभंग होगा और फिर इसके कुंठा व गुस्से में बदलने का असली जोखिम है, जिसके कारण अपराध, अशांति, नफरत और अस्थिरता बढ़ेगी। इस जॉब संकट के कई कारण हैं। एक कारण तो ऑटोमेशन है, जो सरकार अथवा नागरिकों के तात्कालिक नियंत्रण में नहीं है। मसलन, ऑनलाइन शॉपिंग रिटेल और साथ में इसके रोजगार को चौपट कर रही है। ऑनलाइन बैंकिंग और एटीएम बैंक शाखाओं के जॉब खत्म कर रहे हैं। यह सूची लंबी है। देश यदि कोई कदम उठा सकता है तो वह है अत्याधुनिक इनोवेशन को पुरस्कृत करे।
इससे यह सुनिश्चित होगा कि यदि नई टेक्नोलॉजी जॉब खत्म भी करे तो हम इसके शीर्ष पर हों और टेक्नोलॉजी जो नए जॉब निर्मित कर रही है उसका लाभ उठा सकें। लेकिन, हम तो वंशवाद, संपर्क और यारी-दोस्ती वाले पूंजीवाद को पुरस्कृत करते हैं। इनोवेशन को पुरस्कृत करने वाले समाज की रचना बिल्कुल अलग ढंग से होती है। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत होती है और सबके लिए सफल होने के निष्पक्ष व समान अवसर उपलब्ध होते हैं। अब हम उन तत्वों पर आते हैं, जिन्हें हम कंट्रोल कर सकते हैं। इन पर इसी वक्त काम करना होगा ताकि रोजगार की स्थिति बदली जा सके। इन तीन मुख्य क्षेत्रों में हम नाकाम हुए हैं।
एक, सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने सरकार व निजी क्षेत्र के रिश्ते बिगाड़ दिए हैं। बहुत गहराई में हर भारतीय नेता और आईएएस बाबू इसे बहुत पसंद करता है कि कोई अरबपति उनके पास हाथ जोड़ता हुआ आए। ‘देखा इतना अमीर आदमी भी मेरे आगे झुकता है,’ यही इसका मजा है। इसने सरकार व निजी क्षेत्र के रिश्तों को भयावह रूप दे दिया है। ऐसे कानून हैं, जिनका इस्तेमाल किसी भी ब़िजनेस मालिक को परेशान करने के िलए किया जा सकता है। उन्हें चुने हुए तरीके से लागू किया जाता है ताकि निजी बिज़नेस को काबू में रखा जा सके।
पिछले कुछ वर्षों में खासतौर पर यह रिश्ता और खराब हुआ है। नोटबंदी और जीएसटी ने सिर्फ अस्थायी आर्थिक मंदी को ही जन्म नहीं दिया बल्कि बिज़नेस मालिकों में यह खौफ पैदा कर दिया है कि वे हमारे पीछे पड़ गए हैं। इसके कारण बिज़नेस मालिक भारत में बड़ा निवेश करने के पहले सैकड़ों बार सोचता है, क्योंकि किसी गुमनाम से सरकारी विभाग से कोई अनजान आदमी डंडा लेकर हाजिर हो जाएगा। हो सकता है कि वह इतनी जोर से डंडा घुमाए कि बिज़नेस ही चलने लायक न रहे। इसलिए क्यों जोखिम मोल लें? उदाहरण के लिए आज भारत में रियल एस्टेट सेक्टर चरमरा गया है। रेरा अधिनियम कुछ स्वरूप में आवश्यक हो सकता है पर वह बिल्डर के लिए कष्टदायक है। कर बहुत अधिक है। खरीदार टैक्स चुकाने के बाद की आमदनी से फ्लैट खरीदता है, वह जीएसटी चुकाएगा फिर स्टैम्प ड्यूटी तो है ही। ऐसे में कोई सेक्टर कैसे फल-फूल सकता है? दो, हमारी मैन्युफैक्चरिंग ऊपर नहीं उठ सकी। ‘मैक इन इंडिया’ नहीं चला। सरकार व निजी क्षेत्र का बिगड़ा रिश्ता इसका एक अंग है। दूसरा है भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित न होना। जब तक देश के भीतरी भागों में फैक्ट्री लगाना आसान नहीं होगा, तब तक दूसरी-तीसरी श्रेणी के शहरों में जॉब निर्मित नहीं होंगे।
तीन, हमारी शिक्षा व्यवस्था। जहां काम के रिक्त पदों की समस्या है वहीं प्रशिक्षित छात्रों का अभाव दूसरा बड़ा कारण है। ‘अच्छी तरह से शिक्षितों’ में अपेक्षाएं बढ़ने के साथ संदिग्ध कॉलेज मशरूम की तरह उग आए हैं। छात्र वहां से निरर्थक डिग्रियां लेकर बाहर आते हैं। वे वर्कफोर्स में शामिल होने लायक नहीं रहते। ‘लाभ कमाने’ वाले यूनिवर्सिटी और विदेशी यूनिवर्सिटी के परिसरों को अनुमति न देने के फैसले से संदिग्ध लोगों को सेक्टर पर राज चलाने का मौका मिल गया। यदि हम जानबूझकर निरर्थक ग्रेजुएट पैदा कर रहे हों तो कोई अचरज नहीं कि उद्योग उन्हें लेने को तैयार नहीं हैं।
कुल मिलाकर हमें असली सुधारों की जरूरत है, जिसमें यह भी शामिल है कि सरकार अक्षरश: पीछे चली जाए और निजी क्षेत्र को बढ़ने और सांस लेने दे। हमारी शिक्षा प्रणाली को भी इस तरह ढालना होगा कि हमारी महत्वपूर्ण कंपनियों को इससे फायदा मिल सके और शिक्षा क्षेत्र के दिग्गज इसमें प्रवेश करें ताकि संदिग्ध लोग बाहर हो जाएं। जॉब सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं है। यह व्यक्ति की पहचान का बड़ा हिस्सा हो सकता है। यदि हम अपनी नई पीढ़ी को जॉब नहीं उपलब्ध नहीं करा सकते, तो एक राष्ट्र के रूप में हम नाकाम हो जाएंगे। भारतीय युवा इससे बेहतर स्थिति के हकदार हैं।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

चेतन भगत
chetan.bhagat@gmail.com