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कल्पेश याग्निक का कॉलम: शेर जैसे शहीदों के लिए रो क्यों रहे हो? माओ-माओ वाले नक्सलियों के लिए जवानों के हाथ तो खाेलो

छत्तीसगढ़ के दक्षिण सुकमा में शेर जैसे 25 सीआरपीएफ जवानों ने हमारे लिए प्राण दे दिए। अमर हो गए।

Dainik Bhaskar

Mar 10, 2018, 07:45 AM IST
कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं। कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।

"कम ऑन, किल मी..." -एक जानलेवा चुनौती

जानें किस मिट्‌टी के बने होंगे सारे जवान- जो मौत की आंखों में आंखें डाले बस, बढ़ते ही चले जाते हैं।
- भारत की मिट्‌टी से। निश्चित ही।
जितना गर्व इन जवानों की शहादत पर होता है, उतनी ही ईर्ष्या भी। कि देश के लिए, देशवासियाें की रक्षा के लिए इस तरह शौर्य दिखाते हुए मिट जाने का माद्दा और मौका इन्हें मिला।
हम सभी ऋणों से मुक्त हो सकते हैं- मातृभूमि के ऋण से नहीं। किन्तु एक सैनिक, एक सिपाही, एक जवान लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होते ही अपनी माटी से भी ऋण हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के दक्षिण सुकमा में शेर जैसे 25 सीआरपीएफ जवानों ने हमारे लिए प्राण दे दिए। -अमर हो गए।
किन्तु शहीदों के लिए रोने की आवश्यकता नहीं। उनके घरवाले, उतनी ही बुलंदी से अपने बच्चों को भी सुरक्षा बलों में भेजने की बात कह रहे हैं।
हां, यदि कुछ करना ही है, तो केंद्र सरकार और हिंसा से त्रस्त कोई दस राज्यों की सरकारों पर दबाव बनाएं- कि
गीदड़ जैसे माओ-माओ रटने वाले नक्सली हत्यारांे के लिए कुछ समय के लिए हमारे जवानों को खुला हाथ दे दें। उनके हाथ खोल दें। उन्हें केवल एक जवान का कर्तव्य निभाने दें।
यह कोई भावावेश में लिखी पंक्तियां नहीं हैं। ही कोई अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।
तथ्य हैं। तर्क हैं। कुछ पन्ने पलटने होंगे। कोई पचास वर्ष पुराने।
हम सभी सुन ही रहे हैं न, कि नक्सलबाड़ी के 50 वर्ष इसी माह हुए हैं। कई निबंध लिखे जा रहे हैं। खूब चर्चा हो रही है। किताबें। गोष्ठियां। ब्लॉग। ट्वीट।
और क्या निचोड़ बताया जा रहा है? हम पाएंगे :
1. हिंसा की प्रशंसा: यहकहकर कि वह गरीबों के पक्ष में थी
2. हमलों की पैरवी: यहकहकर कि वह अमीरांे पर थे
3. हत्या का पक्ष: यहकहकर कि ज़मींदार कोई और भाषा समझते नहीं थे।
4. हथियारों की अनिवार्यता: यहजताकर कि “सशस्त्र क्रांति’ को लागू करने के लिए उन वामपंथियों ने ऐसा किया।
5. हत्यारों का महिमामंडन: यहकहकर कि असहाय किसान को ज़मीन दिलाने के लिए ज़मींदारों को मौत के घाट उतारना विवशता थी।
6. हक़ और हद की अलग परिभाषा: यहसमझाते हुए कि हक छीनने के लिए हर तरह की हद पार करनी जरूरी है।
पचास वर्ष पहले सिलिगुड़ी में उग्र कम्युनिस्टों ने तय किया कि वे “सशस्त्र क्रांति’ लाएंगे। चीन के चेयरमैन माओ त्से तुंग को “हमारा चेयरमैन’ कहकर “विदेशी गुलामी’ के अतिरेक में बहे, इसी सशस्त्र, हिंसक क्रांति के जनक चारू मज़ूमदार को हम जानते हैं, जानना चाहते हैं।
चारू के हमलावर विचार को बंगाल की नक्सलबाड़ी में वास्तविक आकार देने वाले उग्र कानू सान्याल का भी यही हाल है। और नक्सलबाड़ी में एक जमींदार की हत्या कर, गर्दन काटने के लिए कुख्यात हुआ जंगल संथाल भी पूरी तरह गुमनाम हो गया।
किन्तु कम्युनिस्ट चालाक होते हैं।
गरीबों, मज़दूरों, किसानों के नाम पर भय, भ्रम और भूख़ की भयंकर राजनीति करना जानते हैं।
और ऐसे-ऐसे जनवादी जुमले बुनते हैं कि कोई भी अभावग्रस्त, दिग्भ्रमित हो जाए। कोई भी पीड़ित, क्रुद्ध हो हिंसक हो जाए। और भाषा, शैली और पाखंड इस तरह का कि विद्वान, शिक्षक, कलाकार, साहित्यकार और विशेषकर इतिहास में रुचि रखने वाले- बुरी तरह प्रभावित हो जाएं।
इसीलिए, जिन्हें देशवासियों ने याद रखने योग्य माना- उन्हें कम्युनिस्ट प्रचारकांे ने जिंदा रखा। केवल जिंदा रखा, वरन “हीरो’ बनाकर पेश किया।
विश्व इतिहास में संभवत: यह अनोखी घटना होगी कि गरीबों के नाम पर हत्याओं को सही ठहराया गया। और हत्यारों को महान चिंतक और निस्वार्थ क्रांतिकारी घोषित किया गया।
अनोखा मात्र यह नहीं था। अनोखी बात तो यह है कि भ्रष्ट महिमामंडन आज भी जारी है।
नाम दे दिया गया नक्सली। खुद नाम रख लिया माओवादी। आखिर कौन हैं ये नक्सली-माओ-माओ टर्राने वाले?
छंटे हुए गुण्डों को- जो चाेरी, कामचोरी करते हुए लूटपाट और मारपीट में आगे बढ़ते गए। और फिर उपद्रवी होकर हिंसक संगठन की निगाह मंे गए। वहां हथियारांे की ट्रेनिंग पाकर बाकायदा हमलावर बन गए।
और अब? बेचारे, मजबूर गांव वालों को डरा-धमकाकर उन पर शासन कर रहे हैं। कानून के रखवालों की हत्या करने के लिए दिन-रात गोपनीय ठिकाने तलाशते रहते हैं। सिर्फ उन्हीं इलाकों में अपना साम्राज्य बनाते हैं- जहां करोड़ों, अरबाें रुपए लगे हांे। उद्याेग-धंधे हों। ऐसे आदिवासी घने इलाके- जहां प्राकृतिक संपदा अकूत हो। खदानों की भरमार हो। कोयला, लौह-आयरन ओर, बॉक्साइट के खनन में भारी रकम लग रही हो।
ताकि, उन्हें लूटा जा सके।
दूर-दूराज़ के दुर्गम रास्तों में जगह-जगह बारूदी सुरंग बिछाई जा सके।
और ऐसा इसलिए- कि “विचारधारा’ के नाम पर कोई भी उन्हें लुटेरा नहीं कहेगा। गरीबाें को उनका हक दिलाने की “विचारधारा’ उन्हें बुद्धिजीवियों में, इन्टेलिजेंशिया में, पहले ही लोकप्रिय बनाए हुए है।
कोई नहीं पड़ताल करेगा कि दारुण दारिद्रय के लिए लड़ने का ढोल पीटने वालों के पास करोड़ों रुपए की लागत वाले हथियार कहां से आते हैं? कोई नहीं प्रश्न उठाता कि निर्धन आदिवासियों को ज़मीन जंगल की उपज दिलाने का दावा कर रहे इन हिंस्र तत्वों को बसों में बैठे निर्दोष, ग़रीब से ग़रीब, यात्रियों को लूटने और चुन-चुनकर उन्हें मौत के घाट उतारने की विचारधारा किसने दी?
कोई सरकार उन पर हमला करेगी ही नहीं। कमज़ोर और अकर्मण्य कारण वही हैं- जो नक्सली-माअो-माओ पुकारने वाले हत्यारों को पहले से पता थे :
कि कोई भी सरकार, कोई भी सुरक्षा बल- अपने ही देश के लोगांे पर दुश्मनाें की तरह गोलियां क्यांेकर चलाएगी? भले ही वे लोग, दुश्मन देशों की तरह हमारे जवानों और नागरिकों की जान लेते जा रहे हों।
वामपंथी विद्वान अर्धसत्य इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि पूर्ण सत्य भी भ्रमित हो जाए।
नक्सलबाड़ी से शुरू आंदोलन हिंसक होकर भी संभवत: ग़रीबों को ज़मीन दिलाने या अत्याचार से मुक्त कराने के लिए रहा होगा।
किन्तु फिर भी वह इतिहास के कूड़ेदान में जाने के लायक ही है, क्योंकि हत्या से शुरू हुआ। हत्या पर ही खत्म हुआ। चारू मजूमदार की पुलिस हिरासत में मौत। कानू सान्याल ने आत्महत्या कर ली। जंगल संथाल भारी नशे में मर गया।
किन्तु आज वो नक्सली-माओ संतानें बनकर अपराध कर रहे हैं- उनके लिए तो केवल एक ही स्थान है-
जी, नहीं। मैं आतंकियों-आतताइयों को सीधे मौत के घाट उतार देने का पक्षधर नहीं हूं।
इतनी आसान मृत्यु नहीं मिलनी चाहिए।
यंत्रणा देनी होगी। थर्ड डिग्री। वह भी कानूनन।
शरीर जितना दर्द सह सकता है- उससे कहीं, कहीं अधिक यातना उसे दी जा सकती है। और समूचा विश्व जानता है : आतंकी मौत से नहीं डरते। बल्कि मरने के लिए ही आते हैं।
आतंकी-नक्सली-माओ-पुत्र, सभी यंत्रणा से थर-थर कांपते हैं।
मैं जानता हूं सभ्य समाज के प्रभावशाली सुशिक्षित बुद्धिजीवी इसे मानवाधिकारांे का हनन घोषित कर, भारी विरोध करेंगे। पता नहीं, कानून भी इसे स्वीकार करे।
किन्तु यदि पिछले 50 वर्षों की हिंसा का सही उत्तर देना हो- तो यही है।
यंत्रणा दो। उगलवाओ। गवाही दिलवाओ। लम्बी, उबाऊ कानूनी कार्रवाई से गुजारो।
वकील। अपील। दलील। तारीख। 10-12 हजार ही तो हैं कुल नक्सली। इतने ही मुकदमे होंगे।
जब जेल की काल कोठरी में, अन्य खूंखार कैदियों के बीच रहेंगे- अगली तारीख का इंतजार करते हुए उन कैदियों के आक्रोश का शिकार वैसे ही होंगे, जैसे बाकी हत्या के आरोपी होते हैं, तो सारा आतंक भूल जाएंगे।
मैंने लिखा था बिन लादेन भी सुरक्षा बलों से डरता था। गिरफ्त में आने से।
क्योंकि हर हत्यारा, प्रताड़ना से ही कांपता है।
नक्सली हमलों के बाद एक उबकाई सी पैदा कर देने वाले तर्क सामने आने लगते हैं-
- आदिवासी इसलिए माओ कहने वालों के साथ हैं- क्योंकि आज़ादी के 70 वर्षों में भी उनकी समस्या हल नहीं हुई।
- हमारी फोर्स, स्थानीय बोली नहीं जानती। जबकि नक्सली उनकी बोली में, उनके लिए लड़ते हैं।
- हमारे जवानों को स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना होगा। अभी स्थानीय लोग नक्सलियों पर भरोसा करते हैं।
- हमारे सीआरपीएफ जवानों को जंगल वाॅरफेयर की वैसी ट्रेनिंग प्राप्त नहीं हैं।
धोखा हैं ये झूठे तर्क।
क्या 40-50 वर्षों में हम , हमारी सरकारें, हमारे सैनिक, हमारे सीआरपीएफ जवान या हमारे पुलिस वाले- कोई कुछ नहीं समझ पाया?
और बंगाल से आंध्र अाए, आंध्र से ओडिशा गए, वहां से महाराष्ट्र, सब दूर से छत्तीसगढ़ पहुंचे नक्सली हत्यारे सारी स्थानीय बोली सीख गए? सब स्थानीय दर्द समझ गए? सभी वनवासी उनसे मिल गए? भरोसा करने लगे?
क्या इसी भरोसे के आधार पर सुकमा के बुर्कापाल में वो 300-400 नक्सलियों ने उन “भरोसा कर रहे’ वनवासियों को ढाल बनाकर शिखण्डी शैली में हमारे जवानाें पर कायरना हमला किया?
माओ-माओ पुकारने वाले नक्सलियाें के इस तरह शिखण्डी आक्रमणों का विरोध हमारे जवानाें काे खुले हाथ से करने का अवसर सरकारें दे सकें- असंभव है। किन्तु देना ही होगा।
क्योंकि योद्धा से पूछिए। वह केवल स्वतंत्रता चाहता है। शत्रु के विरुद्ध शौर्य दिखाने की स्वतंत्रता।
और, हां, इसके लिए केवल आर्मी में होना जरूरी नहीं। सीआरपीएफ, बीएसएफ और पुलिस भी रणबांकुरों से भरी पड़ी है। जय हिन्द।

(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

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