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गुस्से के युग में अपनी जीवनशैली को श्रेष्ठ न मानें

देश के हर वर्ग में बढ़ता रोष व असंतोष और रोजगार बढ़ाने पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत

गुरचरण दास | Last Modified - Feb 23, 2018, 12:56 AM IST

गुस्से के युग में अपनी जीवनशैली को श्रेष्ठ न मानें

प्रत्येक नए वर्ष पर मेरे पड़ोसी महोदय बहुत प्रयत्नपूर्वक संकल्प लेते हैं और उतनी ही फुर्ती से जनवरी खत्म होने के पहले उन्हें तोड़ भी डालते हैं। हम आमतौर पर साल के पहले हफ्ते में मिलकर एक-दूसरे को अपने संकल्प बताते हैं लेकिन, मैं जनवरी में म्यांमार व दक्षिण-पूर्वी एशिया में था तो हम पिछले हफ्ते ही मिल पाए, जब मेरी पत्नी ने उन्हें एक मग मसाला चाय के लिए आमंत्रित किया। ‘तो बताएं इस साल आपका इरादा कौन-से संकल्प तोड़ने का है?’ मेरे पड़ोसी ने कबूल किया कि उनका एक संकल्प तो राजनीति और धर्म पर कम गुस्सा करने का है।


पंकज मिश्रा की गहरी दृष्टि देने वाली किताब ‘एज ऑफ एंगर’ के मुताबिक हम क्रोध के युग में जी रहे हैं। राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलनों के फिर उदय ने भारत सहित पूरी दुनिया का ध्रुवीकरण किया है। हम हमेशा मौजूद हिंसा से गुजर रहे हैं, जिसे अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत और राष्ट्रवाद के विषैले रूपों से ईंधन मिल रहा है। दक्षिणपंथी अतिवादियों की हिंसा के बराबर ही उदारवादियों का अहंकार है, जो सहिष्णुता के नाम पर उन लोगों के साथ ठीक वैसा ही असहिष्णु व्यवहार करते हैं, जिनकी आस्थाएं उनसे अलग हैं। खामियां दोनों तरफ हैं और 2018 के लिए मोदी के श्रेष्ठतम संकल्पों में से एक यह होना चाहिए कि इस विभाजन को भरें, सोशल मीडिया में अधिक सभ्य बहस लाएं और हमारी ज़िंदगियों को अधिक शांत बनाएं। भारत आज उपद्रवग्रस्त और असंतुष्ट राष्ट्र है। बुद्धिजीवी वर्ग मोदी पर गुस्सा है कि वे देश का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। वामपंथ अब तक 2014 में उनकी विजय को पचा नहीं पाया है और यह देख स्तब्ध है कि उनकी लोकप्रियता बरकरार है और 2019 के लिए कोई विकल्प नहीं दिखाई देता। हिंदू क्रोधित हैं, क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग ने उनकी हिंदू पहचान को उनके लिए शर्म का विषय बना दिया है।


हिंदूत्व पर सतत जोर देने से मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। दलित और ओबीसी गुस्से में हैं, क्योंकि वे भाजपा के उच्चवर्गीय पूर्वग्रह के कारण अपमानित और बहिष्कृत महसूस कर रहे हैं। मध्यवर्ग क्रोधित हैं, क्योंकि भारत की आर्थिक नीतियों ने हमारे देश को पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों से बहुत पीछे कर दिया है। इन सारी वास्तविकताओं के भारत के साथ आम आदमी की नाराजगी है कि अंग्रेजी बोलने वाले श्रेष्ठि वर्ग ने ‘आधुनिकता के श्रेष्ठतम फल’ हथिया लिए हैं। वंचित नाराज हैं कि मोदी ने रोजगार और अच्छे दिन के वादे पूरे नहीं किए। इन सारे लोगों के गुस्से को पहचान पर जोर देने का तैयार औजार मिल गया- गुजरात में पाटीदार, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, आंध्र में कापुस और असम में अहोम आंदोलन इसी के लक्षण हैं।


गुस्से में आमतौर पर किसी प्रकार का बदला लेने की इच्छा अंतर्निहित होती है, यह इच्छा कि गलत करने वाले को तकलीफ पहुंचनी चाहिए। बेशक यह तर्कहीन है, क्योंकि गलत करने वाले के कष्ट भुगतने से शिकार हुए व्यक्ति की तकलीफ खत्म नहीं हो सकती या जो हुआ उसे उलटा नहीं जा सकता। गुस्से का जवाब यह है कि या तो इस पर तब तक हंसा जाए जब तक कि यह चला नहीं जाता अथवा कोई करुणामय उम्मीद जगाने वाला नेता खोज लिया जाए जैसे महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग या नेल्सन मंडेला, जो लोगों को क्षमाशीलता का महत्व समझाए। क्रोध का विरोध करना न सिर्फ हमारी मानवीयता बल्कि विवेक को भी रेखांकित करता है। भारत जैसे महात्वाकांक्षी देश में तो यह और भी जरूरी है। राजनीतिक गुस्से का एकमात्र फायदा यह है कि यह हमें बाहर निकलकर वोट देने को बाध्य करता है।


फिर क्रोध की राजनीति की सही प्रतिक्रिया क्या हो? महाभारत में युधिष्ठिर का जवाब था क्षमा और सहिष्णुता। उन्होंने दुर्योधन को जुए में चालबाजी के जरिये उनका राज्य छीनने के लिए क्षमा कर दिया। द्रौपदी चाहती थी कि वे सेना खड़ी करके बदला लेकर राज्य वापस छीन लें पर उन्होंने जवाब दिया कि जुए में हारने के बाद उन्होंने निर्वासन में जाने का वादा किया है। इसी तरह युद्ध के बाद उन्होंने धृतराष्ट्र को भी माफ कर दिया और उन्हें सिंहासन पर बैठाकर उनके नाम पर शासन करने का प्रस्ताव रखा। विद्वानों का मानना है कि चूंकि महाभारत 500 वर्षों में विकसित हुआ है तो युधिष्ठिर का पात्र बौद्ध सम्राट अशोक के अहिंसा के आदर्शों से प्रभावित रहा है, जिनके धर्मस्तंभ ‘सभी नस्लों के लिए सम्मान’ का संदेश देते हैं। लेकिन भीष्म ने युधिष्ठिर को कहा कि शासक का काम क्षमा करना नहीं बल्कि न्याय देना है।


भारत में सारी सरकारें धार्मिक व जातिगत पहचानों को पुचकारने के कारण समूह के ऊपर व्यक्ति की प्रमुखता पर जोर देने में विफल रही हैं। धर्म दुधारी तलवार है। जहां यह हमारी भ्रमित, अनिश्चित निजी ज़िंदगियों को अर्थ प्रदान करता है वहीं यह एक विशिष्ट पहचान भी निर्मित करता है और यह जल्दी ही सार्वजनिक रूप से खुद को व्यक्त करने लगती है। प्रतिस्पर्धात्मक लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्ष राजनीति अपने आप सामने नहीं आती। पश्चिम में राजनेताओं को राजनीति से धर्म को पूरी तरह हटाने के लिए प्रेरित करने में सदियां लग गईं। इस्लामी जगत अब भी इस समस्या से संघर्ष कर रहा है। भारत में सहिष्णुता की परम्परा रही है, जिसे महात्मा गांधी ने फिर जागृत किया। मोदी लोगों को याद दिलाएं कि साधारण भारतीय देश को हिंदू पाकिस्तान नहीं बनाना चाहते।


समस्या तब शुरू होती है, जब धर्म राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करता है। किसी धर्म में विश्वास करने वाला तो स्वाभाविक रूप से यही मानेगा कि उसकी पद्धति श्रेष्ठतम है। धार्मिक विश्वासों से दूर रहने वाले धर्मनिरपेक्षवादियों को भी धार्मिक नागरिकों के दृढ़ विश्वासों को महत्व देना चाहिए और भारतीय राजनीति को मुस्लिमों के लिए हिंदू घृणा के लेंस से देखना बंद करना चाहिए। हिंदुओं को नीचा दिखाकर वे उनके रोष को मजबूती देकर उन्हें हिंदुत्व में और गहरे धकेल देते हैं। सबसे बढ़कर तो यह है कि हर किसी को यह मानना छोड़ देना चाहिए कि उनकी जीवनशैली ही श्रेष्ठतम है।


मोदी को साम्प्रदायिक हिंसा जरा भी बर्दाश्त न करते हुए अपना पूरा ध्यान जॉब पैदा करने पर लगाना चाहिए। अर्थव्यवस्था में जान आते ही इस्लामी और हिंदू दोनों तरह के धार्मिक कट्‌टरपंथी अपने जॉब में डूब जाएंगे, अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजेंगे और सामान्य मध्यवर्गीय जीवन जीने लगेंगे। चूंकि युद्ध की बजाय शांति का आकर्षण अधिक होता है, व्यापार-व्यवसाय उपलब्धियों की राह के रूप में धार्मिक श्रेष्ठता व विजयों की जगह ले लेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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