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टैक्स वसूलना व कालाधन उजागर करना ही विकास नहीं

रोजगार बिना आर्थिक सुधार का राग अलापना बेमानी है। स्टार्टअप इंडिया की हालत भी खराब है।

रिज़वान अंसारी | Last Modified - Feb 23, 2018, 12:21 AM IST

टैक्स वसूलना व कालाधन उजागर करना ही विकास नहीं

‘युवाओं को रोजगार’ किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है और जब देश की लगभग 65 फीसदी आबादी युवा हो तो इसकी महत्ता समझी जा सकती है। पूर्ववर्ती सरकार में बेरोजगारी की स्थिति पर कटाक्ष करने वाली मौजूदा सरकार औसत रोजगार सृजन करने में भी विफल रही है। श्रम ब्यूरो की मानें तो पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार में वर्ष 2011 में 9.3 लाख नौकरियों के मुकाबले मौजूदा मोदी सरकार में 2015-16 में केवल 1.35 लाख नौकरियां ही पैदा हो सकीं।


प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ रोजगार देने का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री मोदी की सरकार पिछले तीन वर्षों में लगभग साढ़े चार लाख रोजगार ही पैदा कर सकी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की मानें तो वर्ष 2016-17 में 1.77 करोड़ युवा बेरोजगार थे, जबकि 2017-18 में 1.78 करोड़। मोदी सरकार के आधिकारिक आंकड़ों की ही मानें तो देश भर में कुल पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 4 करोड़ 82लाख 61 हजार हैं। नोटबंदी और जीएसटी के परिप्रेक्ष्य में देखें तो, सरकार यह क्यों भूल जाती है कि आर्थिक सुधार का अर्थ केवल ‘कर संग्रह’ में वृद्धि या काला धन रखने वालों को बेनकाब करना ही नहीं होता बल्कि रोजगार के अवसर पैदा कर नागरिकों की स्थिति को सुदृढ़ करना भी महत्वपूर्ण आर्थिक लक्ष्य है। सोचिए कि अगर रोजगार के अभाव में जीवन की गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा निम्न हो जाए, तो स्थिति कितनी नाजुक हो जाएगी। ये वो दो पहलू हैं जो जीडीपी पर बुरा असर डालते हैं। लिहाजा, रोजगार बिना आर्थिक सुधार का राग अलापना बेमानी है।


‘स्टार्टअप इंडिया’, स्टैंडअप इंडिया, मुद्रा योजना, ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ अब तक रंग नहीं ला सकी हैं। कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षित युवा भी अधिकतर बेरोजगार हैं। स्टार्टअप इंडिया की हालत भी खराब है। 90 फीसदी स्टार्टअप पूंजी के अभाव में बंद हो चुके हैं। शिक्षा, रेलवे, चिकित्सा आदि में रिक्तियां बांट जोह रही है। लिहाजा सरकार संजीदगी से इन पहलुओं पर विचार करे, अन्यथा युवाओं में असंतोष सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

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