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नंबर गेम छोड़कर छात्रों को मानसिक रूप से दृढ़ बनाना होगा

दुर्भाग्य से हमारे देश में मानसिकता यह है कि केवल अच्छे अंक लाने वाले ही सफल हैं।

Danik Bhaskar | Feb 22, 2018, 10:03 AM IST
24 साल के कैलाश बिश्नोई दिल्ली व 24 साल के कैलाश बिश्नोई दिल्ली व

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में छात्रों से ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हुए कहा कि मार्क्स जिं़दगी नहीं होती तथा किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमत्ता का पैमाना महज अंकों का प्रतिशत नहीं होता, क्योंकि हर बच्चे के पास अपनी विशिष्ट प्रतिभा होती है। उन्हें भीतर छिपी क्षमताओं को जगाना चाहिए। प्रधानमंत्री की इन बातों का महत्व इसलिए ज्यादा है, क्योंकि बोर्ड परीक्षाओं में 95 से 100 प्रतिशत हासिल करने की अंधी दौड़ मची है तथा 95 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले छात्र औसत कहलाने लगे हैं।

कई बार विद्यार्थी परीक्षा में अपनी उम्मीदों से कुछ कम अंक आने पर निराश तथा हताश हो जाते हैं और अपनी जिं़दगी ही दांव पर लगा देते हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश में मानसिकता यह है कि केवल अच्छे अंक लाने वाले ही सफल हैं, जबकि वास्तविकता में ज्ञान का अंकों से कोई खास लेना-देना नहीं होता है। सबसे अव्वल दर्जे के अंक के आधार पर इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि इन अंकों के साथ पास बच्चा व्यावहारिकता में उतना ही योग्य भी होगा। लेकिन आज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य अंकों की इस दौड़ में कहीं गुम होकर रह गया है।

देशभर से हर दिन किसी न किसी छात्र के आत्महत्या करने की खबर आती है। छात्रों को डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस अफसर बनने के लिए खूब प्रेरित किया जाता है परंतु जीवन के संघर्षों के प्रति संवेदनशील,मजबूत, सुदृढ़ इन्सान बनने के लिए न के बराबर प्रेरित किया जाता है। ऐसे में पढ़ने-पढ़ाने की पूरी प्रक्रिया और उसके बाद के नतीजों को तौलने-परखने का वक्त आ गया है।

बढ़ते तनाव को कम करने के लिए स्कूलों में भी समय- समय पर बच्चों की काउंसलिंग होनी चाहिए, ताकि वे मानसिक रूप से धैर्यवान, सबल और इस हद तक मजबूत बन सकें कि जीवन की सम्भावित कठिनाइयों, परेशानियों के समक्ष सहज रह सकें। अभिभावकों को भी चाहिए कि नंबर गेम की बजाय बच्चे की प्रतिभा को समझें। तथा उन्हें अपनी रुचि के अनुरूप पढ़ने और कॅरियर का चुनाव करने की आज़ादी दें।