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पकौड़े पर विपक्ष का हंगामा गंभीर राजनीति का परिचय नहीं

विपक्षी दल प्रधानमंत्री के बयान पर सियासी रोटियां संेकने में लगे हैं।

bhaskar News| Last Modified - Feb 09, 2018, 05:06 AM IST

Opposition ruckus on pakodra does not introduce serious politics
पकौड़े पर विपक्ष का हंगामा गंभीर राजनीति का परिचय नहीं

तिल का ताड़ कैसे बनता है और किसी बयान को नेतागण किस प्रकार तोड़-मरोड़कर अपने हित में प्रचारित करते हैं, इसका ताजा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हाल ही में दिया गया पकौड़े बेच कर रोजगार पाने वाला बयान है। प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव के समय युवाओं को रोजगाार देने का बड़ा प्रलोभन दिया था और इसका राजनीतिक लाभ भी उनके दल को मिला किन्तु चुनाव के बाद की स्थितियां स्पष्ट करती हैं कि उनका रोजगार सम्बंधी वादा पूरा नहीं हुआ है और इसी की बौखलाहट उनके इस बयान में जाहिर हो रही है।


व्यावहारिक स्तर पर रोजगार के अन्तर्गत सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों सहित व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर किए जाने वाले समस्त व्यवसाय आते हैं, किन्तु आज का युवा रोजगार के रूप में किसी देशी-विदेशी कंपनी की नौकरी अथवा सरकारी-गैरसरकारी संस्था की नौकरी को ही रोजगार समझता है। इसी अर्थ मंे उसने प्रधानमंत्री का वादा स्वीकार किया था किन्तु जब उसे उसकी पूर्वधारणा के विपरीत पकौड़ा व्यवसाय जैसी व्यवस्था की सलाह दी गई तो बेरोजगार युवा वर्ग का आक्रोशित होना स्वाभाविक ही है।
प्रश्न यह भी है कि मूंगफली, चाट, पकौड़ा, भेलपूरी, खिलौने, फल, मिठाई जैसे व्यवसाय करने के लिए बड़ी-बड़ी डिग्रियां प्राप्त करने की क्या आवश्यकता है? ये कार्य तो बिना डिग्रियों के भी हो सकते हैं। यह रोचक है कि होटल, केटरिंग जैसे बड़े व्यवसायों में खाने-पीने की चीजें बनाने-बेचने को सम्मानजनक समझा जाता है जबकि छोटे स्तर पर स्टॉल या ठेले पर यही व्यवसाय तुच्छ माना जा रहा है। विपक्षी दल प्रधानमंत्री के बयान पर सियासी रोटियां संेकने में लगे हैं।


चुनावी घोषणा-पत्र में किए गए वादें पूरा करना सत्ताधारी दल की नैतिक जिम्मेदारी होती है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता किन्तु कंाग्रेस एवं अन्य विपक्षी दल रोजगार के वादे पर जिस प्रकार सरकार की टांग खींच रहे हैं वह शर्मनाक है। ऐसे चुनावी वादे इन दलों ने भी सत्ता में रहकर कभी पूरे नहीं किए। उन्हें ओछी राजनीति से बाज आना चाहिए।

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