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संस्कृति के नाम पर हमलों का विरोध करना होगा

परम्परा के बहाने खास किस्म की सामाजिक व्यवस्था थोपने और आमूल बदलाव रोकने के प्रयास

Dainik Bhaskar

Feb 22, 2018, 09:33 AM IST
शशि थरूर विदेश मामलों की संसदी शशि थरूर विदेश मामलों की संसदी

पिछले साल 22 मार्च से 15 दिसंबर के बीच साथ में बाहर घूम रहे करीब 21,37,520 युवा पुरुष और महिलाओं से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एंटी रोमियो स्क्वाड ने पूछताछ की। इससे हमारा ध्यान इस गंभीर तथ्य की ओर जाता है कि आज के भारत में कितनी अधिक नैतिक निगरानी बढ़ गई है। इससे भी बुरी बात तो यह है कि जिन लोगों से पूछताछ की गई उनमें से 9,33,099 लोगों को आधिकारिक रूप से ‘चेतावनी’ दी गई और 3,003 लोगों के खिलाफ 1,706 एफआईआर दर्ज की गई। यह सब सिर्फ नौ माह से भी कम समय में हुआ।

कभी मुक्त रहा समाज अब इस प्रकार संकुचित हो गया है : एक सब-इंस्पेक्टर व दो कॉन्स्टेबल वाले कई पुलिस दस्ते उत्तर प्रदेश के यूनिवर्सिटी परिसरों, कॉलेज प्रांगण, सिनेमा थिएटर, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थानों में ‘रोमियो’ की तलाश में गश्त लगा रहे हैं। ‘रोमियो’ की अस्पष्ट-सी परिभाषा पुलिसकर्मियों को किसी भी युगल को रोककर पूछताछ का हक दे देती है। जहां कभी इसका इरादा सार्वजनिक स्थानों पर मंडरा रहे बेहूदा लोगों द्वारा छेड़छाड़ रोकना था वहीं सिर्फ संख्या से ही इसकी पुष्टि हो जाती है कि अब प्रताड़ना अधिकारियों की ओर से हो रही है, उनके निशाने पर रखे असामाजिक तत्वों की ओर से नहीं। फिर ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ यह नाम ही बहुत कुछ कहता है। इसका मूल मेरी युवावस्था के दिनों के ‘रोडसाइड रोमियो’ में है- ये बदचलन किस्म के टाइट पेंट, घुंघराले वालों और बांकी मूंछों वाले आमतौर पर बेरोजगार शख्स होते थे, जो गुजरती महिलाओं को देख सीटी बजाते या बॉलीवुड का कोई गीत गुनगुनाने लगते। उसकी आमतौर पर अनदेखी की जाती थी। वे ज्यादातर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे।

आज उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने काफी व्यापक लक्ष्य है : रोमियो कोई भी ऐसा युवा हो सकता है, जिसकी हसरत अपनी जूलियट को लुभाने की हो। शेक्सपीयर का रोमियो भी तो सारी परम्पराएं तोड़कर गलत परिवार की लड़की के प्रेम की खातिर असहमत पालकों को छोड़ आया था। योगी आदित्यनाथ नहीं चाहते कि रोमियो के 21वीं सदी के अवतार यह करें। यह स्क्वाड किसी भी ऐसे सांस्कृतिक चलन पर लगातार हो रहे हमलों का नवीनतम चिह्न है, जिसे भारतीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार हिंदुत्व लायक नहीं मानते। प्रदेश में योगी की जीत न होने तक वैलेंटाइन डे के प्रेमियों पर निगरानी का काम कई प्रकार के सेना और दल के बदलाव विरोधी तत्वों ने ले लिया था। अब एक प्रकार के रिवर्स-प्राइवेटाइजेशन के तहत यह काम भाजपा शासित राज्य ने लिया है।

फ्रीलांस एंटी-रोमांस उपद्रवियों का क्या? बरसों तक 14 फरवरी को हाथ में हाथ लेकर घूम रहे युगलों पर हमला करने, वैलेंटाइन डे के ग्रीटिंग कार्ड बेच रही दुकानों में तोड़फोड़ करने और प्रेम की पींगें बढ़ा रहे युगलों वाले कैफे के बाहर नारेबाजी करने के बाद हिंदुत्व आंदोलनकारियों ने पिछले साल रणनीति बदली। हिंदू महासभा ने घोषणा कि कि वह वैलेंटाइन डे पर दस्ते भेजकर अविवाहित युगलों को पकड़कर मंदिर में ले जाकर उनका विवाह कर देगी (और हिंदुत्ववादी सांसद और गोडसे प्रशंसक साक्षी महाराज की चलती तो उन्हें चार से दस बच्चों को जन्म देने पर लेक्चर भी दिया जाता)। उपद्रवियों का कहना है कि वेलेंटाइन डे आयातित उत्सव है, जो सही है (लेकिन फिर क्रिसमस या मिलाद-उन-नबी या अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी तो हैं पर उनमें हिम्मत नहीं है कि इन मौकों पर हमले करें)। उनकी यह दलील भी है कि यह रूमानी प्रेम का जश्न है और इसलिए अभारतीय है। इतिहासकार बताते हैं कि हिंदू संस्कृति में प्रेम के देवता कामदेव की आराधना की स्थापित परम्परा है। लेकिन, हिंदू महासभा में किसे हिंदू परम्परा का वास्तविक ज्ञान है। भारतीय मूल्यों का उनका विचार न सिर्फ आदिकालीन और संकुचित है बल्कि बुरी तरह इतिहास विरोधी है। आज जिसे पीडीए यानी प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन कहते हैं वह प्राचीन भारत में काफी चलन में था। 11वीं सदी तक हिंदू यौन स्वातंत्र्य पर मुस्लिम जगत से आने वाले यात्रियों की हैरत जताने वाली प्रतिक्रियाएं मिलती हैं।

सच तो यह है कि वैलेंटाइन डे का जश्न तो वास्तव में मुस्लिम संस्कृति आने के पहले की संस्कृति का ही उत्सव है, जो खजुराहों में दिखाई देते स्वरूप की तुलना में अधिक सौम्य रूप में है। कैसी विडंबना है कि इसे हिंदू संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार खारिज कर रहे हैं।

लेकिन आइए सच का सामना करें : इस सारे उपद्रव का डेटिंग कर रहे टीनेजर से कम और धर्मनिरपेक्ष भारत को अपने विचार का हिंदू राज्य बनाने के सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक प्रोजेक्ट से अधिक है। संस्कृति के नाम पर परम्परा को स्थापित किया जा रहा है। परम्परावाद उनको बहुत रास आता है, जो सामाजिक व्यवस्था, अनुशासन और एकरूपता थोपना और आमूल बदलाव रोकना चाहते हैं। प्रेम प्रकरण जाति या धर्म की रेखाओं के परे भी जा सकते हैं इसलिए वे उन्हें इस सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा समझकर खारिज करना चाहते हैं। इससे भी बुरा तो यह है कि ये प्रसंग व्यक्ति व महिला के चुनने के अधिकार की स्वतंत्रता व्यक्त करते हैं, जो उन लोगों के लिए अभिशाप की तरह है, जो हम सबको चेहराविहीन गोपूजक बनाने को प्राथमिकता देंगे।

यह सब भारतीय संस्कृति के नाम पर किया जा रहा है, जो भारत के वास्तविक भूतकाल के नकार और कल्पित भूतकाल पर आधारित है। भारतीय संस्कृति हमेशा विस्तार मूलक रही है। उसने ग्रीकों से (जिन्होंने हिंदुओं को मंदिर बनाकर देवताओं की उपासना करना सिखाया) से लेकर ब्रिटिश (जिन्होंने हमारा दंड विधान बनाया) प्रभाव तक सबकुछ ग्रहण किया। समकालीन भारतीय सभ्यता में केंद्रीय संघर्ष दो वर्गों के बीच है। एक जो मानते हैं कि हमारे ऐतिहासिक अनुभव के कारण हम व्यापक हैं, इतनी बहुलता में है और दूसरे वे जिन्होंने उत्तरोत्तर संकुचित संदर्भों में यह परिभाषित करने का ठेका ले लिया है कि ‘सच्चे अर्थों में’ भारतीय क्या है। संविधान ही एकमात्र सच्ची भारतीयता का ठोस आधार है। वे सब जो संविधान लिखित स्वतंत्रताओं को मानते हैं उन्हें एंटी-रोमियो स्क्वाड जैसी घातक प्रवृत्तियों का विरोध करना चाहिए। ‘तुम रोमियो क्यों हो? शेक्सपीयर की हीरोइन पूछती है। हम क्यों हैं? हमें जूलियट के पक्ष में खड़ा होना ही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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शशि थरूर विदेश मामलों की संसदीशशि थरूर विदेश मामलों की संसदी
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