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सिद्धारमैया की उदार सोशल इंजीनियरिंग का जोखिम / सिद्धारमैया की उदार सोशल इंजीनियरिंग का जोखिम

Bhaskar News

Mar 21, 2018, 02:54 AM IST

लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश करके जोखिम भरा दांव खेला है।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया।     - फ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया। - फ
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कर्नाटक के कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आगामी चुनाव में भाजपा का मुकाबला करने के लिए लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश करके जोखिम भरा दांव खेला है। न्यायमूर्ति नागामोहन दास की रिपोर्ट को आधार बनाकर सिद्धारमैया मंत्रिमंडल ने यह सिफारिश केंद्र को भेजकर भाजपा का सिरदर्द बढ़ा दिया है। वजह साफ है राज्य में 17 प्रतिशत आबादी वाला लिंगायत समुदाय विधानसभा की 224 में से करीब 100 सीटों को प्रभावित करता है, जो भाजपा का परंपरागत समर्थक माना जाता है। भाजपा के राज्य अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा और दूसरे प्रमुख नेता जगदीश शेट्‌टार भी लिंगायत हैं। भाजपा लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक मानने का विरोध करती रही है। दक्षिण के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और केरल तक फैले इस समुदाय की वर्चस्वशाली जाति वीरशैव भी अल्पसंख्यक दर्जे के विरुद्ध रही है। राज्य सरकार ने न सिर्फ लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक माना है बल्कि वीरशैवों को भी उनके समुदाय का हिस्सा माना है। इसलिए यह फैसला भाजपा के परंपरागत मतदाताओं में विभाजन पैदा करेगा और कांग्रेस को उम्मीद है कि उसे इसका लाभ मिलेगा। कुल 92 उपजातियों में बंटे लिंगायत समुदाय में इस बात पर अंतर्संघर्ष चल रहा है कि 12वीं सदी के उनके धर्मगुरु बसवन्ना की असली शिक्षाएं क्या हैं। बसवन्ना जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के साथ ब्राह्मणवादी संस्कारों के विरुद्ध थे। लिंगायतों का कहना है कि आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर काबिज वीरशैव बसवन्ना की शिक्षाओं के विरुद्ध उन पर ब्राह्मणवादी संस्कार लाद रहे हैं। बसवन्ना शिव के उपासक थे लेकिन, उनके शिव हिंदू धर्म के शिव से भिन्न हैं। ताराचंद और हुमायूं कबीर जैसे विद्वानों ने शव को दफनाने वाले लिंगायतों पर हिंदू धर्म से ज्यादा इस्लाम का प्रभाव देखा था। हालांकि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में उसे खारिज करते हुए इसे बौद्ध और संत परंपरा से जोड़ा था। ऊपर से देखने पर कांग्रेस का यह फैसला भले ही वोट की राजनीति से प्रेरित लगे लेकिन, आंतरिक रूप से यह भारतीय समाज की उदार परंपरा को वैधता देने वाला एक कदम है। देश की उदार और क्रांतिकारी परंपराओं पर प्रहार और अनुदार परंपराओं की स्थापना में लगी भाजपा के समक्ष यह निर्णय दुविधा और चुनौती पैदा करने वाला है।

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