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संविधान निर्माताओं के भरोसे को कायम रखे चुनाव आयोग

यह भी पहली ही बार था जब चुनाव की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में आ गया।

रिजवान अंसारी | Last Modified - Mar 28, 2018, 11:51 PM IST

संविधान निर्माताओं के भरोसे को कायम रखे चुनाव आयोग
यह पहली बार था जब चुनाव आयोग से पहले ही किसी व्यक्ति ने चुनाव होने की तारीख की घोषणा कर दी हो। भारत के इतिहास में यह भी पहली बार था जब चुनावी घोषणा का लम्हा मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए शर्मिंदगी का लम्हा था। यह भी पहली ही बार था जब चुनाव की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में आ गया। लिहाजा, एक संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग पर विश्वसनीयता का संकट मंडराया हो। चंद दिनों पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता बहाल करने पर आयोग को फजीहत झेलनी पड़ी थी। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि आयोग का निर्णय ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के विपरीत है। मामला चाहे ईवीएम का हो या हालिया गुजरात व हिमाचल चुनाव में तारीखों की घोषणा का, आयोग पर सत्ताधारी पार्टी के प्रभाव में काम करने का गंभीर आरोप लगता रहा है। हम सभी जानते हैं कि चुनावी प्रक्रिया एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमाण है। लेकिन, जब आयोग की गोपनीयता का राजनीतिक दल हरण कर ले, जब आयोग की कार्यशैली पर न्यायपालिका ही प्रश्न चिह्न लगा दे, तब देश की 130 करोड़ जनता के मन में संदेह पैदा होना लाजिमी है। ऐसे में चुनाव आयोग की जवाबदेही बढ़ जाती है कि वह अपनी प्रतिष्ठा को धूमिल होने से कैसे बचाता है।
सच कहा जाए तो, जिस तरह आयोग की आचार संहिता की सियासी दल धज्जियां उड़ाते हैं और आयोग लाचार नज़र आता है। उससे यह भरोसा नहीं होता कि आयोग चुनावी तारीख के लीक होने पर सख्त कार्रवाई करेगा। लिहाजा, आयोग को अपनी स्वायत्तता और संवैधानिक शक्ति का उपयोग कर पूरे देश को एक मजबूत और भरोसेमंद संदेश देने की आवश्यकता है। आयोग को यह यकीन दिलाना होगा कि जिस लोकतंत्र को बचाए रखने की उम्मीद के साथ संविधान निर्माताओं ने आयोग को आजादी दी थी, उसमें रत्ती भर अंतर नहीं आया है।
यह पहली बार था जब चुनाव आयोग से पहले ही किसी व्यक्ति ने चुनाव होने की तारीख की घोषणा कर दी हो। भारत के इतिहास में यह भी पहली बार था जब चुनावी घोषणा का लम्हा मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए शर्मिंदगी का लम्हा था। यह भी पहली ही बार था जब चुनाव की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में आ गया। लिहाजा, एक संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग पर विश्वसनीयता का संकट मंडराया हो। चंद दिनों पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता बहाल करने पर आयोग को फजीहत झेलनी पड़ी थी। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि आयोग का निर्णय ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के विपरीत है। मामला चाहे ईवीएम का हो या हालिया गुजरात व हिमाचल चुनाव में तारीखों की घोषणा का, आयोग पर सत्ताधारी पार्टी के प्रभाव में काम करने का गंभीर आरोप लगता रहा है। हम सभी जानते हैं कि चुनावी प्रक्रिया एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमाण है। लेकिन, जब आयोग की गोपनीयता का राजनीतिक दल हरण कर ले, जब आयोग की कार्यशैली पर न्यायपालिका ही प्रश्न चिह्न लगा दे, तब देश की 130 करोड़ जनता के मन में संदेह पैदा होना लाजिमी है। ऐसे में चुनाव आयोग की जवाबदेही बढ़ जाती है कि वह अपनी प्रतिष्ठा को धूमिल होने से कैसे बचाता है।
सच कहा जाए तो, जिस तरह आयोग की आचार संहिता की सियासी दल धज्जियां उड़ाते हैं और आयोग लाचार नज़र आता है। उससे यह भरोसा नहीं होता कि आयोग चुनावी तारीख के लीक होने पर सख्त कार्रवाई करेगा। लिहाजा, आयोग को अपनी स्वायत्तता और संवैधानिक शक्ति का उपयोग कर पूरे देश को एक मजबूत और भरोसेमंद संदेश देने की आवश्यकता है। आयोग को यह यकीन दिलाना होगा कि जिस लोकतंत्र को बचाए रखने की उम्मीद के साथ संविधान निर्माताओं ने आयोग को आजादी दी थी, उसमें रत्ती भर अंतर नहीं आया है।
रिजवान अंसारी
rizwan911ansari@gmail.com
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