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न्यायाधीशों के ‘विद्रोह’ के बाद बदलाव भी हो

संदर्भ: इमरजेंसी में खुद के संरक्षण के लिए किए उपायों ने न्यायपालिका को गोपनीय दायरे में सीमित कर दिया

Danik Bhaskar | Jan 19, 2018, 05:38 AM IST

कुछ दिन पहले एक वरिष्ठ न्यायविद ने मुझे याद दिलाया, ‘पत्रकारों और वकीलों में एक बात समान है, हम दोनों को ही गॉसिप पसंद है।’ उस हफ्ते जब सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने एक तरह से चीफ जस्टिस के खिलाफ ‘विद्रोह’ कर दिया तो गॉसिप ने तथ्यों का स्थान ले लिया था। चाहे सीपीआई नेता डी राजा के जस्टिस चेलमेश्वर से मिलने की बात हो या प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव की चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से भेंट या फुल कोर्ट में जज के रोने की रिपोर्ट हो हर बात पर अटकलें लगाई गईं। इसमें उस काले लेकिन क्रांतिकारी शुक्रवार को न्यायपालिका के लिए क्या हुआ इसका वास्तविक महत्व खो गया।


इस ‘क्रांति’ के केंद्र में चार मूल मुद्‌दे हैं। एक, चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने असाधारण पहल करके न्यायिक जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। यह ऐसा धूसर क्षेत्र है, जिसमें सेमीनारों में तो बहस होती रही है पर शायद ही कभी इस पर ठोस कदम उठा हो। यह सिर्फ ‘हू विल जज द जज’ यानी न्याय करने वाले जज का न्याय कौन करेगा का मामला नहीं था बल्कि प्रश्न और भी महत्वपूर्ण था कि चीफ जस्टिस का न्याय कौन करेगा। अपनी शिकायतों को सार्वजनिक करके चार वरिष्ठ जजों ने न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की भीतरी शिकायत निवारण प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर प्रश्न खड़े किए बल्कि रोस्टर पर चीफ जस्टीस के बेलगाम अधिकार को भी चुनौती दी। जाहिर था कि जज चीफ जस्टिस पर ‘बेंच फिक्सिंग’ का आरोप लगा रहे थे और इस तरह चीफ जस्टिस के पद में भरोसे की कमी जता रहे थे। संदेश एकदम स्पष्ट है : चीफ जस्टिस का पद कानूनी जांच के परे नहीं है। वे प्रशासनिक सुविधा के लिए ‘रोस्टर के मास्टर’ बनाए गए हैं लेकिन, इससे उनका अपने आप बचाव नहीं हो जाता।


दो, न्यायिक भ्रष्टाचार की अधिक गंभीर चिंता भी है, जिसका परीक्षण होना चाहिए। चार जजों ने नाम तो नहीं लिए पर अब यह स्पष्ट है कि ओडिशा मेडिकल परीक्षा घोटाले के ट्रांसक्रिप्ट की जांच होनी चाहिए। यदि सीबीआई ने प्राथमिक जांच के बाद एक जज द्वारा ‘इलीगल ग्रैटीफिकेशन’ का उल्लेख किया है तो निश्चित ही संबंधित जज के खिलाफ एफआईआर दायर करने की अनुमति देनी चाहिए। इसमें नाकामी से विचलित करने वाले सवाल उठेंगे कि क्या ऊंचे पद वाले व्यक्तियों को संरक्षण देने का प्रयास किया जा रहा है?


तीन, न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्ते भी जांच के घेरे में हैं। बढ़ते अविश्वास से यह बात तब रेखांकित हुई जब पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर न्यायपालिका की आलोचना पर प्रधानमंत्री मोदी के सामने रो पड़े थे। जहां न्यायपालिका ने पूरी शिद्‌दत के साथ अपने क्षेत्र को संरक्षित रखने का प्रयास किया है, जबकि राजनीतिक कार्यपालिका को लंबे समय से लगता रहा है कि न्यायिक हस्तक्षेप ने उसके अधिकारों का वजन कम किया है। फिर रिटायरमेंट बाद के फायदों के आकर्षण का मतलब है जज भी राजनीतिक दवाब में आ सकते हैं। जब सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस राज्यपाल और बहुत सारे भत्तों के साथ सरकारी समितियों के प्रमुख नियुक्ति किए जाते हैं, तो यह मानने का लोभ होता है कि जजों को भी सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जाने के लिए लुभाया जा सकता है (निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड जज सरकार से कोई फायदा स्वीकार करे उसके पहले कम से कम दो साल का अंतराल होना चाहिए?)। फिर तो चाहे जज लोया का मामला हो या आगे आने वाला विस्फोटक अयोध्या का मामला, यह डर बना रहेगा कि ‘राजनीतिक रूप से संवेदनशील’ मामले के फैसलों में हेर-फेर हो सकता है।


आखिर में, सांस्थानिक ईमानदारी का भी प्रश्न है। कोई संस्थान अपनी नैतिक और कानूनी पवित्रता कैसे कायम रख सकता है यदि यह ज़मीर के मुद्दों पर व्यापक रूप से विभाजित हो जाता है? न्यायपालिका में लोगों का भरोसा इस विश्वास पर बना है कि हमारे सम्मानीय जज चरित्रवान स्त्री-पुरुष हैं। अदालतों में गड़बड़ी की आशंका ने यह विश्वास हिला दिया है। बेशक, फैसले ‘फिक्स’ होने की रिपोर्टें रही हैं तथा अब उनकी उपेक्षा करना या अपवाद मानना मुमकिन नहीं है। इसीलिए कुछ अच्छे लोगों का खड़े होना इतना महत्वपूर्ण है।


मोदी पर संदेह करने वाले यह मानना चाहेंगे कि न्यायपालिका के ये रोग मई 2014 में भाजपा की जबर्दस्त जीत से निकले हैं, जिसने राजनीतिक नेतृत्व को यकीन दिला दिया कि वह अदालतों को अपने हिसाब से चलाने में कामयाब हो सकता है। सच यह है कि भारतीय न्यायपालिका का मौजूदा संकट उस वक्त तक जाता है जब न्यायिक नियुक्तियां अपारदर्शी तरीके से की जाती थीं। पहले इंदिरा गांधी के युग में दंभी राजनीतिक नेतृत्व द्वारा और बाद में अत्यंत कड़ी बनावट वाले जजों के कोलेजियम द्वारा। कोलेजियम सिस्टम मूलत: जजों को उन अतियों से बचाने के लिए था, जो इमरजेंसी के वर्षों में अस्तित्व में आई थीं। जब जजों के दमन से न्यायपालिका के सामने सर्वोच्च स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप का जोखिम पैदा हो गया था।


दुर्भाग्य से जजों को उनकी नियुक्तियों व तबादलों का मालिक बनने देने का नतीजा यह हुआ कि न्यायिक ‘स्वतंत्रता’ की बिना पर न्यायपालिका किसी विशिष्ट, गोपनीय क्लब की तरह व्यवहार करने लगी। खुद को संरक्षण देने में इसने प्राय: अदालत की अवमानना और महाभियोग चलाने की बोझिल प्रक्रिया जैसी संवैधानिक गारंटी का कानूनी हथियार की तरह इस्तेमाल किया और मौन व गोपनीयता की लगभग अभेद्य दीवार बना ली (स्वतंत्रता के बाद से न्यायिक कदाचार के लिए जिन जजों पर महाभियोग चलाने की मांग की गई उनकी संख्या अब भी एक अंक में ही है)।


यही वह दीवार है, जिसे चेलमेश्वर के नेतृत्व वाले विद्रोह ने तोड़ा है और आखिरकार कुछ रोशनी डाली है कि न्यायिक सत्ता के अंधेरे घेरे में क्या हो रहा है। इसी कारण ‘विद्रोही’ जजों का साहसी कदम टू चिअर्स का हकदार है। थर्ड चीअर तब होगा जब इस विद्रोह से कुछ असली सुधार और बदलाव हों।


पुनश्च : वॉट्सएप पर चल रहे एक जोक में कहा गया कि बीसीसीआई को अब सुप्रीम कोर्ट में सुधार लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करनी चाहिए। जब कोई सम्माननीय संस्था मजाक का विषय हो जाए तो इससे जरूरत से ज्यादा देर होने के पहले उस ढहती व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत रेखांकित
होती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई
वरिष्ठ पत्रकार
rajdeepsardesai52@gmail.com