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शेयर बाजार सच्चे अर्थ में पूंजी निर्माण के केंद्र बने

अब ट्रेडिंग की बजाय निवेश पर जोर दे रहा है बीएसई

Danik Bhaskar | Jan 05, 2018, 06:59 AM IST
अशीष चौहान, एमडी और सीईओ,  बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज अशीष चौहान, एमडी और सीईओ, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज

पिछले 25 वर्षों से ऑटोमेशन ने ट्रेडिंग की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है। जो कभी जल्दी से जल्दी कुछ मिनटों में किया जा सकता था, वह 1992 में एक सेकंड या उससे भी कम समय में होने लगा। अब तो यह सेकंड के 1,50,000वें हिस्से में होने लगा है। एलगोरिदम ट्रेडिंग के आने के साथ इसकी रफ्तार और को-लोकेशन सुविधाओं के कारण ट्रेडिंग का आकार कई गुना बढ़ गया। अनुमान है कि 1992 से 2017 तक 25 वर्षों से भी ज्यादा समय में भारतीय शेयर बाजार का आकार 5000 गुना या 5 लाख फीसदी बढ़ गया है। आश्चर्य की बात है कि भारत में द्वितीयक बाजार में निवेश अथवा ट्रेडिंग करने वाले लोगों की संख्या इन 25 वर्षों में ज्यादा नहीं बढ़ी है। जबकि तथ्य यह है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी कई गुना बढ़ी है। हम बाजारों में भागीदार बनने वाले लोगों की संख्या मध्य वर्ग की संख्या बढ़ने के साथ बढ़ा क्यों नहीं सके? बाजार जो मूलत: निवेश के लिए डिजाइन किए गए थे, उन्होंने खुद को ट्रेडिंग बाजारों में बदल लिया। भारत में पिछले 25 वर्षों में बाजारों में निवेश करने वाले लोगों की संख्या किसी भी दृष्टि से देखें तो 2 फीसदी से ऊपर नहीं गई है।


इसका यह भी मतलब है कि भारतीय शेयर बाजार निवेशकों की भागीदारी को अगले दशक में 25 से 50 फीसदी की दर तक पहुंचाने के लिए भारतीय शेयर बाजार निवेशक 10 से 25 गुना बढ़ सकते हैं जब भारत मध्यवर्गीय देशों के समूह में पहुंच जाएगा। सूचीबद्ध कंपनियों में भारतीय बाजार पूंजीकरण अगले 15 वर्षों में 2.3 लाख करोड़ डॉलर की मौजूदा स्थिति से 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने की अपेक्षा है।


निवेशकों और कुल निवेश में यह वृद्धि संभव है यदि हम बाजार में और भरोसा पैदा करें और फाइनेंशियल प्रोडक्ट को अधिक संख्या में भारतीयों के बीच वितरीत कर सकें। यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत होगी कि बाजार में निवेश करने के लिए आने वाले नए लोग दीर्घावधि के कम जोखिम वाले वित्तीय उत्पादों में निवेश करें। वे अत्यधिक जोखिम वाले डे-ट्रेडिंग और डेरिवेटिव ट्रेडिंग में शामिल न हो यदि उन क्षेत्रों के लिए आवश्यक कौशल उनके पास नहीं है। इस उद्‌दे्श्य से बीएसई फाइनेंशियल प्रोडक्ट स्पेक्यूलेशन और ट्रेडिंग की बजाय निवेश के लिए वितरीत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। राष्ट्र की संपदा सिर्फ स्पेक्यूलेटिव अथवा अल्पावधि की ट्रेडिंग गतिविधियों से निर्मित नहीं की जा सकती। राष्ट्र को अपनी बचत को उत्पादक पूंजी में दोहन करना सीखना होगा, जो जीरो सम न होकर समय के साथ अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ बढ़े। बीएसई ने ई-आईपीओ, बॉन्ड डिस्ट्रीब्यूशन, बीएसई स्टार एमएफ, एसएमई आदि जैसे कई मार्केट लीडिंग और इनोवेटिव फ्रेमवर्क निकाले हैं।


बाजार में 70 फीसदी हिस्सेदारी वाला ‘बीएसई इलेक्ट्रॉनिक बॉन्ड’ कंपनियों के लिए बड़े पैमाने पर डेब्ट फंड खड़ा करने का पसंदीदा प्लेटफॉर्म बन गया है। 1 अप्रैल 2016 से बीएसई बॉन्ड प्लेटफॉर्म ने 2.5 लाख करोड़ रुपए इकट्‌ठा किए हैं। बीएसई एसएमई ने अब 213 कंपनियों के लिए 1,757 करोड़ रुपए खड़े किए हैं, जिनका बाजार पूंजीकरण 20,493 करोड़ रुपए हो गया है। इसी प्रकार ‘बीएसई स्टार-एमएफ’ म्युचुअल फंड वितरीत करने का देश का सबसे बड़ा डिजिटल प्लेटफॉर्म है। एक्सचेंज से वितरीत फंड्स में इसका मार्केट शेयर करीब 80 फीसदी के करीब है। ऐसा नहीं था कि म्युचुअल फंड सिर्फ एक्सचेंज से ही वितरीत करना अनिवार्य हो। लेकिन, बेहतर कीमत और रफ्तार, सुविधा, निरंतरता और बीएसई स्टार एमएफ प्लेटफॉर्म से जुड़ी कम लागत के कारण अब इससे 3000 शहरों में 2 लाख लोग जुड़ गए हैं। बीएसई स्टार एमएफ ने पिछले दो वर्षों में 500 फीसदी वृद्धि देखी है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में सिर्फ पहले 9 माह में ही 75 हजार करोड़ रुपए का रिकॉर्ड एक करोड़ ट्रांजेक्शन्स देखे हैं।


बीएसई ने खुद को इनवेस्टमेंट एक्सचेंज ऑफ इंडिया के रूप में स्थापित किया है और कई उद्‌देश्य हासिल किए हैं। इस अवधारणा को और आगे ले जाने के लिए बीएसई अब 3000 हजार से ज्यादा शहरों में इससे जुड़े 2 लाख लोगों के जरिये इंश्योरेंस वितरण भी उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है। हमें उम्मीद है कि यह निवेश करने वाली जनता के लिए उतना ही उपयोगी होगा जितना यह एजेंट व अन्य मध्यवर्ती लोगों के लिए होगा, जो कई इंशोरेंस कंपनियों के लिए स्वचालित एकल खिड़की के फ्रेमवर्क से वाकिफ होंगे।

भारतीय वित्तीय वितरण व्यवस्था तेजी से बदल रही है। बीएसई भारत की बढ़ती और लगातार बदलती आवश्यकताओं के अनुसार आधुनिक टेक्नोलॉजी को अपनाने का नेतृत्व किया है जैसे यह 142 वर्षों से निभाता आ रहा है। बीएसई अब सिर्फ स्पेक्यूलेटिव संस्था की बजाय सच्चे अर्थों में देश में पूंजी निर्माण के लिए कैटेलिस्ट यानी उत्प्रेरक बन गया है।