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व्यवसाय आसान करने की दिशा में बढ़ना होगा

बुनियादी ढांचे में निजी निवेश की वापसी आवश्यक

Dainik Bhaskar

Jan 23, 2018, 06:50 AM IST
assocham secretary general ds rawat article in bhaskar

आगामी केंद्रीय बजट में कारोबार की बात करें तो प्राथमिकताएं एकदम स्पष्ट हैं- बिज़नेस को स्पर्धा के हिसाब से मजबूत बनाना, बिज़नेस करने को आसान बनाने की दिशा में आगे बढ़ना, बुनियादी ढांचा मजबूत करना और निजी निवेश की मजबूत वापसी को संभव बनाना। जहां तक बिज़नेस को आसान बनाने का सवाल है तो बेकार के कानूनी विवादों से कारोबार को मुक्त रखने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसमें दोहरा करारोपण प्रमुख है।

सामाजिक-आर्थिक वृद्धि को आगे बढ़ाने की दृष्टि से बिज़नेस ट्रस्ट जैसे रीयल इस्टेट इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (आरईआईटी) और इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (आईएनवीआईटी) कुछ साल पहले लाए गए थे। लेकिन पास-थ्रो बेनिफिट (यानी बिज़नेस का टैक्स उसके मालिकों के व्यक्तिगत रिटर्न में पहुंचना) के अभाव में काफी वक्त गुजरने के बाद भी इन बिज़नेस ट्रस्ट की वृद्धि रुक गई है। संक्षेप में इन दोनों ट्रस्ट के लिए नई करारोपण प्रणाली लाई जानी चाहिए। अभी पास-थ्रो बेनिफिट वेंचर कैपिटल फंड को ही उपलब्ध है। इसे अन्य श्रेणियों व उपश्रेणियों तक बढ़ाना चाहिए। इसके साथ आरईआईटी को योगदान के माध्यम से रीयल इस्टेट प्रॉपर्टी के हस्तांतरण को कैपिटल गैन्स टैक्स से भी छूट देनी चाहिए।


बढ़ते वैश्वीकरण के साथ विभिन्न देशों में श्रम बल की आवाजाही तेज हुई है। ऐसे में जो कंपनी लेबर भेजती है वह उस कंपनी की ओर से वेतन व अन्य लागत चुकाती है, जो बाद में उस विदेशी कंपनी द्वारा लौटाई जाती है। चूंकि ऐसा कर्मचारी भारतीय कंपनी के नियंत्रण में काम करता है और इसलिए आवश्यक रूप से यह भारतीय कंपनी का कर्मचारी है और भारतीय कंपनी द्वारा विदेशी कंपनी को चुकाया गया धन कर्मचारी के वेतन व अन्य कास्ट का रिइम्बर्समेंट होता है। इन मामलों में कई व्यवस्थाएं दी गईं हैं पर यह अब भी कानूनी विवादों से परे नहीं है। इस बारे में विशिष्ट स्पष्टीकरण जोड़ना चाहिए कि भारतीय कंपनी के नियंत्रण में विदेश में काम करने वाले कर्मचारी के वेतन व अन्य लागत के बदले दिया खर्च विशुद्ध रूप से रिइम्बर्समेंट है और यह कर योग्य राशि नहीं है।

एक मामला धारा 2 (22)(ई) का है, जिसके तहत किसी भी आकार के लाभांश पर टैक्स लगता है, जो चाहे शेयरधारक को दिया गया एडवांस हो या लोन हो। जब यह लौटाया जाए तो इस पर फिर टैक्स लागू नहीं हो सकता। मौजूदा प्रावधानों की कठिनाइयां दूर करने के लिए सरकार एक समय-सीमा निर्धारित कर सकती है जैसे अगर दो साल के भीतर लौटा दिया गया तो उसे ‘डीम्ड डिविडेंड’ मानकर उस पर टैक्स नहीं लिया जाए। यदि ऐसा एडवांस या लोन दो साल बाद भी बकाया रहता है तो उसे डीम्ड डिविडेंड मानकर टैक्स वसूला जाए।


जहां तक बुनियादी ढांचे और निजी निवेश को पुनर्जीवित करने की बात है तो इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपिटल कंपनी/फंड को दी जाने वाली छूट की वापसी होनी चाहिए। ब्याज और दीर्घावधि के पूंजीगत फायदों पर कर छूट वापस लेने से ऐसी कंपनी के लिए ऋण की लागत बढ़ जाएगी, जिससे अंतत: प्रोजेक्ट की लागत बढ़ेगी और वह आर्थिक रूप से वहन करने लायक नहीं रहेगा। दीर्घावधि के पूंजीगत फायदों को भी छूट मिलनी चाहिए। बुनियादी ढांचे संबंधी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट स्पेशल परपज़ व्हिकल(एसपीवी) से अमल में लाए जाते हैं, जो कॉन्ट्रेक्ट देते समय सरकारी जरूरत के मुताबिक लाए जाते हैं। एसपीवी शेयर के हस्तांतरण पर धारा 10 (38) के तहत कर छूट नहीं मिल पाएगी, क्योंकि एसपीवी शेयर बाजारों में सूचीबद्ध तो रहेंगे नहीं।


एक मामला इसी धारा के तहत शेयर जारी करने वाली कंपनी द्वारा एफसीईबी स्कीम के तहत शेयरों के हस्तांतरण पर कर छूट का है। सरकार को छूट का दायरा बढ़ाना चाहिए। इसके अलावा वित्त मंत्रालय, कंपनी मामलों के मंत्रालय से सिफारिश करें या सुझाव दें कि वह इसके लिए उचित प्रक्रिया तय करें और इस तरह मान्यताप्राप्त शेयर बाजारों से शेयरों के हस्तांतरण को अनुमति दे। इसी तरह पावर सेक्टर में नए निवेश को टैक्स प्रोत्साहन जारी रखना चाहिए।


इसी तरह कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स का प्रमुख हिस्सा फाइनेंस, एनर्जी और लॉजिस्टिक्स अथवा ट्रान्सपोर्टेशन से जुड़ा है। यहां सरकार से उम्मीद है कि वह विशिष्ट कंपोनेंट्स की वास्तविक लागत पर 150-200 फीसदी वेटेड डिडक्शन दे। इस लागत का ऑडिट हो सकता है और कंपनी के फाइनेंशियल स्टेटमेंट में ड्यूटी भी शामिल रहती है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में निजी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए वेंचर कैपिटल पूल लाना चाहिए।

डीएस रावत
सेक्रेटरी जनरल, एसोचैम

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