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बीमार सरकारी बैंकों की सेहत सुधारने के लिए मेगा प्लान

अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जो कदम उठा रहे हैं वे सही दिशा में हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 06, 2018, 05:43 AM IST

बीमार सरकारी बैंकों की सेहत सुधारने के लिए सरकार के मेगाप्लान के एक हिस्से पर लोकसभा ने मंजूरी दे दी है लेकिन, यह सवाल कायम है कि जिन बॉन्ड के माध्यम से सरकार 80,000 करोड़ रुपए का इंतजाम करेगी कहीं उससे वित्तीय घाटा तो नहीं बढ़ेगा। इस फैसले से पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट बैंक आफ इंडिया जैसे बैंकों के शेयर में क्रमशः 5.9%, 3.71% और 7.72% का तात्कालिक इजाफा हुआ है और मुंबई स्टाक एक्सचेंज में 144 पॉइंट की वृद्धि हुई है। इसीलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि वे अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जो कदम उठा रहे हैं वे सही दिशा में हैं।

हालांकि 7.73 लाख करोड़ के बट्‌टा खाते के कर्ज और पुनर्संयोजित कर्ज की भारी राशि के समक्ष इतनी राशि की योजना को मेगाप्लान कहना थोड़ा अटपटा लगता है फिर भी जिस तरह से सरकार अपनी हर योजना को क्रांतिकारी और ऐतिहासिक बताकर पेश करती है उस लिहाज से यह विशेषण अनुकूल ही है। जहां प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार के मंत्री बट्‌टा खाते के इस कर्ज को यूपीए सरकार की देन बता रहे हैं, वहीं यूपीए के नेता कह रहे हैं कि इसमें चार से पांच लाख करोड़ की बढ़ोतरी तो 2014 के बाद हुई है। पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि बंैकों के विलय से पहले उनके बही खाते दुरुस्त किए जाने चाहिए और यह काम अफसरों की बजाय बैंकरों के माध्यम से किया जाना चाहिए और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

बंैकों की सेहत सुधारने के लिए सरकार ने विमुद्रीकरण की योजना तो लागू की लेकिन, उससे हालत में ज्यादा बदलाव नहीं आया इसीलिए पुनःपूंजीकरण के बॉन्डों का सहारा लिया जा रहा है। सरकार ने इन बॉन्डों के साथ इस बात की एहतियात रखी है कि नकदी का कोई लेन-देन न हो। सरकार प्रतिभूतियां जारी करेगी लेकिन, उसके लिए वैधानिक द्रवता अनुपात (एसएलआर) रखना आवश्यक नहीं होगा। वह इन बॉन्ड के बदले बैंकों से रसीदें हासिल करेगी लेकिन, सवाल उठने लगे हैं कि ये बॉन्ड कर्ज के रूप में होंगे या गैर-कर्ज के रूप में। अगर वे कर्ज के रूप में होंगे तो ऐसा कैसे संभव है कि इनसे वित्तीय घाटा न बढ़े। दूसरी तरफ यह अनुमान भी है कि इन बॉन्ड का स्वरूप 1990 के दशक में जारी बॉन्ड जैसा होगा, जिससे ब्याज के रूप में सरकार का खर्च तो बढ़ेगा लेकिन, वित्तीय घाटा नियंत्रित रहेगा।

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