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सभी वर्गों के लिए सहनशीलता से पैदा होगी सहज राष्ट्रीयता

विस्तार में जाएंगे तो दोनों ओर के आख्यान में खामियां हैं और दोनों इमारतें शौर्य और देशभक्ति की काल्पनिक कथाओं पर निर्मि

Dainik Bhaskar

Jan 05, 2018, 07:02 AM IST
Battle of Bhima Koregaon

भीमा कोरेगांव में यल्गार परिषद के आयोजन और उसके बाद भड़की हिंसा और बंद ने यह साबित कर दिया है कि इस देश के राष्ट्रीय आख्यान में कई परतें और धाराएं हैं और किसी एक आख्यान से समाज के सभी तबकों की सहमति बनाना न तो संभव है और न ही जरूरी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पुणे में पेशवाशाही के सत्ता केंद्र शनिवारवाड़ा के ठीक सामने दलित संगठनों की ओर से भीमा कोरेगांव की विजय के दो सौ साल के उत्सव मनाने के लिए जो आयोजन हुआ वह दलित राष्ट्रीयता की एक अभिव्यक्ति थी जो हिंदुत्व के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भीमा के बहाने एक चुनौती दे रही थी। इसीलिए इस दौर के प्रभावी आख्यान की पैरोकारी कर रहे मीडिया ने उसे राष्ट्रद्रोह की संज्ञा दी और आयोजकों और विरोधियों के बीच समझौता होने के बावजूद आखिरकार टकराव हो ही गया।

भीमा कोरेगांव के युद्ध का एक आयाम अंग्रेजों की खैरख्वाही के साथ ब्राह्मणवाद और अछूतों के साथ होने वाले अत्याचार के विरोध का है। इसका दूसरा आयाम भारतीय शासक बाजीराव पेशवा से जुड़े भारतीयता और देशभक्ति के आख्यान का है। विस्तार में जाएंगे तो दोनों ओर के आख्यान में खामियां हैं और दोनों इमारतें शौर्य और देशभक्ति की काल्पनिक कथाओं पर निर्मित की गई हैं। अगर संघ परिवार देश में पेशवा पद पादशाही लाने का सपना देखता है तो सामान्यतः बेहद कमजोर दलित राष्ट्रीयता महार सैनिकों, दलित संतों और बाबा साहेब आम्बेडकर के जीवन में मिली कामयाबियों के आधार पर अपनी कथा निर्मित करती है। अंग्रेज अगर भारतीय समाज को हिंदू मुस्लिम और सवर्ण-अवर्ण के आधार पर विभाजित करने में सिद्धहस्त रहे हैं तो संघ परिवार दलित संघर्षों की उपेक्षा करते हुए हिंदू-मुस्लिम लड़ाई को प्रमुखता देता रहा है।

आज भले ही संघ परिवार डॉ. भीमराव आम्बेडकर को प्रातः स्मरणीय मानने लगा है लेकिन दलित संघर्षों और उन्हें आदर देने की उसने उपेक्षा की है। दलितों की मौजूदा आक्रामकता और प्रतिरोध यह बताता है कि उसके राम विलास पासवान और रामदास आठवले जैसे नेता भले सरकार के हिस्से हो गए हों लेकिन, बाबा साहेब की जाति उन्मूलन की विचारधारा अभी भी जिंदा है। इसलिए भारतीय राष्ट्रीयता तभी सहज हो सकती है जब वह अपनी विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों की सुने और उनके प्रति एक सहनशीलता विकसित करे।

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