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खुशी हमें भीतर, खुद तक ले जाती है

तनाव में रहना, नाखुश रहना, गुस्से में रहना हमारा स्वाभाव नहीं है। गुरुदेव कहते हैं, ‘जीवन ही खुशी है, जीवन ही प्रेम है,

Danik Bhaskar | Jan 15, 2018, 06:58 AM IST
खुशी मन की सुखद, सकारात्मक, स्वीकार कर पाने की स्थिति है। यह ऐसा ही है जैसे हमारी मां या दादी मां देने में खुशी के भाव खुद में जागृत रखती थीं। मुझे प्रकृति के साथ रहते हुए खुशी मिलती है और यह मेरा स्वाभाव ही है। तनाव में रहना, नाखुश रहना, गुस्से में रहना हमारा स्वाभाव नहीं है। गुरुदेव कहते हैं, ‘जीवन ही खुशी है, जीवन ही प्रेम है, जीवन ही उत्साह है।’
संदेह, हमारी खुशी के लिए उन बादलों के समान हैं, जो कुछ समय में दूर हो जाते हैं। अक्सर हम संदेह में फंसकर रह जाते हैं। यही पर गुरु हमें इन सब संदेहों से परे ले जाते हैं और हमारे जीवन में अंतर पैदा कर देते हैं। उनका ज्ञान और कृपा हमारे उन संदेह के बादलों को छांट देते हैं और हमारे अंदर स्पष्टता आती है। हम कभी बच्चे से नहीं पूछते हैं, ‘तुम अपनी मां के साथ खुश हो?’ गुरु भी मां की तरह हैं जो दिशा देते हैं, हमारी अंदर की चेतना को पोषित करते हैं। आपके माता-पिता जिन्होंने आपको इस दुनिया में लाया है वैसे ही आपके गुरु भी होते हैं। गुरु हमें अज्ञान, गलतफहमी और गलत धारणाओं से दूर कर हमारे सच्चे स्वाभाव अर्थात खुशी की अवस्था में लाते हैं। इसलिए कहा भी गया है कि ‘गुरु बिना गति नही।’
यही एक कारण था कि जिसने मेरे गुुरु श्री श्री रविशंकर के बारे में ‘गुरुदेव - ऑन द प्लेटो ऑफ द पीक’ किताब लिखने के लिए प्रेरित किया। वे मेरे भाई भी हैं। जब भी आप महान लोगों के बारे में पढ़ते हैं तो आप खुद को भी उन से प्रेरित मानते हैं और अपने जीवन में भी सही राह का ज्ञान पाते हैं।
उदाहरण के लिए, गुरुदेव कहते हैं कि समुद्र को देखने का अनुभव हरेक का अपना ही होता है। कुछ वहां चल रही शीतल हवा से ही संतुष्ट हो जाते हैं। कइयों को समुद्र किनारे टहलते हुए सीपियां इकट्‌ठा करना अच्छा लगता है। कुछ को अपने जूते उतारकर आने वाली समुद्र की लहरों में पैर डुबाना अच्छा लगता है। कुछ को उसी समुद्र में कूदकर तैरना और तल से मोती इकट्‌ठा करना अच्छा लगता है। आपकी जो भी इच्छा हो समुद्र पूरी करता है, वह कभी भी अपनी राय नहीं रखता है। वह सिर्फ आपकी सेवा के लिए है। समुद्र कभी दबाव नहीं बनाता है कि आप मोती लो, जबकि आपकी इच्छा सिर्फ किनारे से शीतल हवा लेने की हो। यह तो सिर्फ आप की मर्जी है, बस! इसी तरह गुरु भी ज्ञान के समुद्र हैं, प्रेम की गहराई हैं। वे भी किसी पर कोई दबाव नहीं बनाते हैं लेकिन, वे उन सभी के लिए हमेशा उपलब्ध होते हैं, जिन्हें उनकी जरूरत है। कोई भी प्रेरक साहित्य किसी भी पाठक के लिए खुशी का ही कारण होता है। मुझे ऐसा लगता है कि इस पुस्तक के माध्यम से उसी भावना को अभिव्यक्त कर पाई हूं। मुझे स्वयं गुरुदेव से जुड़ी प्रत्येक घटना को सभी के साथ बांटने में बहुत खुशी महसूस हो रही है।
एक बार पूजा के उपरांत मेरे गुरु, मेरे भाई ने मुझे और मेरी मां को प्रसाद के रूप में पंचात्रम से कुछ जल दिया। मेरी मां ने वह जल पी लिया और पूछा, ‘इस पानी में तुमने क्या मिलाया है?’ वह सचमुच में बहुत ही मीठा और सुगंधित था। मैं जानती थी कि उस जल में कुछ भी नहीं मिलाया गया था, क्यांकि उसे मैंने ही नल के पानी से भरा था। आज वैज्ञानिक बता रहे हैं कि पानी की भी अपनी याददाश्त होती है और उसके क्रिस्टल पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परंतु उन दिनों यह सब एक आश्चर्य ही था। मेरे भाई मां के उस प्रश्न पर सिर्फ मुस्कुराए थे।
उस समय सिर्फ जल ही नहीं वहां की हवा में भी कई तरह की खुशबू आ रही थी। पहले तो गुलाब फिर चमेली और फिर चंदन की......। जब भी वे कोई बड़ी पूजा या यज्ञ समाप्त करते कोई भी मौसम हो बारिश जरूर होती थी। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी यह कहा गया है कि प्रकृति को जो अर्पण किया जाता है वह भी अपनी खुशी बारिश की बूंदों से अभिव्यक्त करती है। हमारा स्वभाव खुशी है। गुरुदेव कहते हैं, ‘किसी भी सुखद अनुभव में हमारी आंखें बंद हो जाती हैं, आप किसी सुगंधित फूल की सुगंध या फिर कोई स्वाद या स्पर्श महसूस करते हैं। इसलिए सुख या खुशी ऐसी ही है जो आपको खुद तक ले जाती हैं। दुख हमेशा आपको खुद से ही दूर ले जाता है। दुख का मतलब है कि आप किसी वस्तु में फंस गए हैं, यह बदलता रहता है और स्वयं पर केंद्रित नहीं होने देता है।’
स्वयं से पूछिए, ‘मैं कैसे अपने आस-पास के लोगों के लिए उपयोगी हो सकता हूं और इस दुनिया के लिए उपयोगी हो सकता हूं?’ तब आपका हदय खिलना प्रारंभ होता है और नया जीवन शुरू हो जाता है। अन्यथा आप हमेशा सोचते हैं, ‘मेरा क्या होगा?’ यह सचमुच ही व्यर्थ हैं! अगले पचास वर्षों में हम शायद यहां नहीं रहें, लेकिन जब तक हैं तो अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं। इस दुनिया को सबसे अच्छा उपहार दे सकते हैं वह है ज्ञान। आप और भी कुछ दे सकते हैं परंतु ज्ञान ही वह दान है जो जीवनपर्यंत के लिए मन को ऊंचाई पर ले जाता है। खुशी हमारे अपने आंतरिक स्वभाव को जानना ही है, यह ज्ञान ही हमारे लिए उपहार है।