संपादकीय

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अखिल भारतीय बनती भाजपा उदार और समावेशी भी बने

भाजपा और संघ परिवार की असली वैचारिक शत्रुता तो कम्युनिस्टों से ही है, क्योंकि कांग्रेस तो कई रूपों में उसके करीब बैठती ह

Danik Bhaskar

Mar 06, 2018, 09:03 AM IST

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव में अपने पक्ष में भारी उलटफेर करके भारतीय जनता पार्टी ने जता दिया है कि विचारधारा, संगठन और नेता की खोज में लगी दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए उससे पार पाना मुश्किल है। राष्ट्रीय स्तर पर नेता, संगठन, संसाधन और कार्यकर्ताओं की फौज से लैस भाजपा ने इन तीनों राज्यों में चुनावी विजय के लिए क्षेत्रीय दलों से सहयोग की वही रणनीति अपनाई जो वह नब्बे के दशक से सफलतापूर्वक अपनाती रही है। उसके विपरीत यूपीए गठबंधन के माध्यम से केंद्र में दस वर्षों तक सरकार चला चुकी और केरल में यूडीएफ जैसा मोर्चा चलाने वाली कांग्रेस पार्टी वैसा करने से चूक गई। कांग्रेस ही क्यों केरल और पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक गठबंधन और मोर्चा बनाकर शासन करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी सैद्धांतिक अकड़ के चलते वह दांव नहीं चल पाई।

भाजपा को वास्तविक कामयाबी त्रिपुरा में हासिल हुई है, जहां उसने अपने दो प्रतिशत से भी कम वोटों को त्रिपुरा मूल निवासी फ्रंट (आईपीएफटी) के साथ मिलकर 50 प्रतिशत तक पहुंचा दिया और कांग्रेस के 36.5 प्रतिशत वोटों को 1.8 प्रतिशत तक ला दिया। भाजपा को त्रिपुरा में दोहरी खुशी प्राप्त हुई है। एक तो उसने वहां 25 वर्षों से सत्ता पर काबिज वाममोर्चा को हटा दिया और दूसरी तरफ कांग्रेस को विपक्ष की पदवी से हटाकर वहां माकपा को पहुंचा दिया। हालांकि, त्रिपुरा में वाममोर्चे का तकरीबन 45 प्रतिशत वोट अभी भी बरकरार है।

भाजपा और संघ परिवार की असली वैचारिक शत्रुता तो कम्युनिस्टों से ही है, क्योंकि कांग्रेस तो कई रूपों में उसके करीब बैठती है। इसलिए सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे होने पर छोटे से राज्य में ही सही लेकिन, वाममोर्चा के एक गढ़ के ढहने से उसकी उन्मुक्त प्रसन्नता स्वाभाविक है। नगालैंड में भाजपा ने सबसे चालाक किस्म का गठबंधन बनाया और पहले की सत्तारूढ़ पार्टी एनपीएफ से संबंध तोड़े बिना एनडीपीपी के साथ तालमेल बनाकर बहुमत का खेल भी साध लिया और कांग्रेस के तकरीबन 25 प्रतिशत मतों को दो प्रतिशत तक कर दिया। पूर्वोत्तर के प्रति भाजपा की यह ललक उसे पहले की कांग्रेस पार्टी की तरह अखिल भारतीय और अजेय तो बनाती है लेकिन, इसकी सार्थकता तब है जब वह सामाजिक समावेशी और उदार भी बने।

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