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राहुल गांधी की ललकार और कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति

यह ललकार भाजपा के शब्दों में हारे हुए नेता की पुकार बनकर रह जाएगी।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 20, 2018, 01:23 AM IST

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी के पूर्णाधिवेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर जो करारा हमला किया है उसका प्रभाव 2019 के आम चुनावों में तभी पड़ेगा जब जमीनी स्तर पर पार्टी के पास कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज या कारगर गठबंधन हो। उसके बिना उनकी यह ललकार भाजपा के शब्दों में हारे हुए नेता की पुकार बनकर रह जाएगी।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पूर्वोत्तर और विशेष कर त्रिपुरा के चुनाव में जीत के बाद भाजपा के भीतर जो आत्मविश्वास कुलाचें भर रहा था उस पर उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के बाद लगाम लगी है। किंतु उसमें कांग्रेस से ज्यादा क्षेत्रीय और मंडलवादी दलों का योगदान है।

उस माहौल को भाजपा विरोधी मानते हुए कांग्रेस ने यूपीए के घटक दलों को एकजुट करने और राष्ट्रीय स्तर पर सरकार विरोधी माहौल बनाने की कवायद शुरू की है। उसी को धार देते हुए राहुल ने सत्य बनाम असत्य और कौरव बनाम पांडव के उन्हीं पौराणिक रूपकों का प्रयोग शुरू किया है, जिसका सर्वाधिक चुटीला और प्रभावशाली इस्तेमाल संघ परिवार करता रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव दर चुनाव जीत हासिल करने के लिए तमाम वादों और जुमलों का इस्तेमाल किया है और पूरे न हो पाने के कारण आज वे तंज के हथियार बन गए हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने जहां अपनी भूलें स्वीकार की हैं वहीं ललित मोदी और नीरव मोदी के उपनामों से प्रधानमंत्री को घेरना चाहा है। वह भूल रही है कि जनमानस में अभी भी यूपीए और कांग्रेस के शासन का भ्रष्टाचार ज्यादा गहराई से अंकित है और एनडीए नेताओं के भ्रष्टाचार लोगों की निगाहों से ओझल ही रहे हैं। ज्यादा तार्किक कांग्रेस का दूसरा आह्वान है जो उसने अर्थव्यवस्था के बहाने किया है। वह प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली को अर्थव्यवस्था के लिए नीम हकीम खतरा-ए-जान बताकर उनके हाथों से 2004 की तरह देश की कमान छीनना चाहती है।

कांग्रेस नोटबंदी, जीएसटी जैसे उन आर्थिक फैसलों को मुद्‌दा बनाने में लगी है। राहुल गांधी और उनकी यह ललकार तभी जनमत को सत्ता परिवर्तन तक ले जा सकती है जब वह जमीनी राजनीति से व्यावहारिक रिश्ता बनाए। वह रिश्ता उन मंडलवादी दलों से गठबंधन के माध्यम से ही बनेगा जो भाजपा की लहर में ध्वस्त होने के बावजूद खड़े होने की उम्मीद जगाते हैं।

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