संपादकीय

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फेसबुक की चोरी व लोकतंत्र के पहरेदारों की गुहार

नई सूचना प्रौद्योगिकी ने लोकतंत्र में जनमत के समक्ष बहला-फुसला और ठग लिए जाने की चुनौती प्रस्तुत की है।

Danik Bhaskar

Mar 24, 2018, 04:25 AM IST

फेसबुक विवाद ने एक बात साबित कर दी है कि ईमानदारी और सच्चाई के शोर के बीच नई प्रौद्योगिकी के सहारे चोर अपना काम करते रहते हैं। कई बार तो इसमें चोर मचाए शोर की भी ध्वनि आती है। इस बीच जनता कुछ जान ही नहीं पाती कि सही कौन है और गलत कौन है। जब तक सच का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह बात कभी अमेरिकी चुनाव और तो कभी ब्रेग्जि़ट के जनमतसंग्रह से साबित होती है। भारत के 2014 के आम चुनाव और 2018 के गुजरात चुनाव की सच्चाई तो अभी सामने आनी है लेकिन, इसे महज भाजपा बनाम कांग्रेस और कैंब्रिज एनालिटिका की फेसबुक से सांठगांठ के रूप में देखना मामले को सीमित करना है। इससे पहले 2011 के अन्ना आंदोलन के दौरान इन माध्यमों का कितना न्यायपूर्ण प्रयोग हुआ यह भी विचार का विषय है।

अच्छी बात यह है कि आंकड़ों की चोरी की बात स्वयं फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने स्वीकार की है। उनकी यह स्वीकारोक्ति भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद की धमकी के बाद आई है, इसलिए यह माना जा सकता है कि उनकी चिंता में भारत के 25 करोड़ फेसबुक यूज़र शामिल हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव में रूस के हस्तक्षेप की जांच चल रही है और उसमें यह बात उभर रही है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के सदस्यों को प्रलोभन देकर उनका डेटा इकट्‌ठा किया और फिर उनकी राय बदलने के लिए फर्जी खबरों, विज्ञापनों और ब्लागों का सिलसिला शुरू कर दिया।

इस बीच जकरबर्ग को अगले वर्ष ब्राजील, अमेरिका और भारत में होने वाले आम चुनावों में अपनी साख मिटने और नाक कटने की चिंता सता रही है। वे इसे रोकने के लिए आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। नई सूचना प्रौद्योगिकी ने लोकतंत्र में जनमत के समक्ष बहला-फुसला और ठग लिए जाने की चुनौती प्रस्तुत की है।

सूचना प्रौद्योगिकी के इस अभियान में लोकतांत्रिक चुनाव एक युद्ध की तरह हो गए हैं, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का इस्तेमाल करते हुए बेहतर मानव समाज बनाने का लक्ष्य खो गया है और सत्ता पाने का लक्ष्य सर्वोपरि हो चला है। इसीलिए पार्टियां और सरकारें तभी कार्रवाई करती हैं जब उनका निहित स्वार्थ आहत होता है। आवश्यकता है कि चर्चा और कार्रवाई नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अस्तित्व को ध्यान में रखकर की जाए।

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