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सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव का अर्थ

इससे एनडीए की दरार उजागर होगी और विपक्षी एकता का माहौल जरूर निर्मित होगा।

Danik Bhaskar | Mar 17, 2018, 08:24 AM IST

यह बात शीशे की तरह साफ है कि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और तेलुगु देशम के अविश्वास प्रस्ताव से नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं गिरनी है लेकिन, इससे एनडीए की दरार उजागर होगी और विपक्षी एकता का माहौल जरूर निर्मित होगा। यह माहौल हाल के उपचुनावों में भाजपा की हार के बाद चल रही महागठबंधन की चर्चा के संदर्भ में और भी मौजूं हो जाता है। हालांकि अभी प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हुआ है और लोकसभा की स्थगित कार्रवाई अब सोमवार को ही शुरू हो पाएगी, इसके बावजूद मौजूदा सरकार के विरोध में उन सभी दलों का साथ आना एक घटना जरूर है जो राज्यों में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने कहा भी है कि हमेशा की तरह तेलुगु देशम ने उसके निर्णय का अनुकरण किया है। ये दोनों पार्टियां आंध्र प्रदेश में एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं और राज्य के विशेष दर्जे के लिए मोदी सरकार का विरोध करते हुए स्थानीय जनता का विश्वास जीतना चाहती हैं। उधर तृणमूल कांग्रेस और माकपा ने भी प्रस्ताव का समर्थन करने का वादा करके पश्चिम बंगाल की अपनी प्रतिद्वंद्विता को किनारे कर दिया है। देखना है कि समाजवादी पार्टी जिसके लोकसभा सदस्यों की संख्या अब सात हो गई है वह क्या फैसला लेती है।

अब सवाल यह है कि शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी का रुख क्या है। वे पार्टियां एनडीए का हिस्सा होते हुए भी प्रधानमंत्री मोदी के रवैए से नाराज बताई जाती हैं। इस बीच अन्नाद्रमुक ने कावेरी प्रबंधन बोर्ड की मांग उछालते हुए सरकार को चेतावनी दी है कि अगर उसने बोर्ड का गठन नहीं किया तो वह भी विरोध में मतदान करेगी। देखा जाए तो टीडीपी-वाईएसआर सीपी और अन्नाद्रमुक की मांगें एक प्रकार से चुनावी मौके पर की जाने वाली सौदेबाजी की रणनीति ही हैं।

संसदीय कार्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने ठीक ही कहा है कि यह चुनावी वर्ष है और ऐसा विरोध व अविश्वास प्रस्ताव परंपरा का एक हिस्सा है। जाहिर है कि भाजपा अपने संख्या बल और संगठन के माध्यम से ऐसी चुनौतियों से निपटने में सक्षम है। फिर भी एनडीए के घटक दलों की ओर से लगाए जाने वाले आरोप मौजूदा सरकार की छवि ज्यादा तेजी से बिगाड़ेंगे। मौजूदा सरकार के चार साल के कार्यकाल के इस पहले अविश्वास प्रस्ताव से कई दलों की झिझक टूटेगी और वे आगामी चुनाव के लिए अपने दोस्त और दुश्मन का फैसला कर सकेंगे।