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कार्ति की गिरफ्तारी के बाद रक्षात्मक हो जाएगा विपक्ष

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 05:26 AM IST

सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर संसद के नए सत्र में विपक्ष को रक्षात्मक करने का प्रयास जरूर किया है।

Bhaskar editorial on karti chidambaram arrested

एअरसेल-मैक्सिस विलय और आईएनएक्स मीडिया में अतिरिक्त निवेश के मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे और व्यापारी कार्ति चिदंबरम की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया की सहज परिणति है या और कुछ यह तो आने वाले समय में अदालत से ही निर्धारित होगा लेकिन, सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर संसद के नए सत्र में विपक्ष को रक्षात्मक करने का प्रयास जरूर किया है। सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि आने वाले सत्र में विपक्ष पीएनबी घोटाले और उसके अभियुक्तों नीरव मोदी, मेहुल चौकसी और पहले भागने वाले ललित मोदी और विजय माल्या को देश लाए जाने का सवाल उठाएगा।

इस तरह से भ्रष्टाचार के मोर्चे पर सरकार की आक्रामकता बेअसर होती नज़र आ रही थी लेकिन, कार्ति की गिरफ्तारी से सरकार ने कांग्रेस को फिर कटघरे में खड़ा करना चाहा है। अब इस मुद्‌दे का इस्तेमाल कर्नाटक और आगामी चुनावों में होगा। सीबीआई का कहना है कि कार्ति जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे इसलिए गिरफ्तार किया गया है, जबकि वकीलों की दलील है कि चार्जशीट के बिना गिरफ्तारी उचित नहीं है। दरअसल, कार्ति से जुड़े मामले उनके पिता के वित्त मंत्री रहने के कार्यकाल से जुड़े हैं और इन मामलों में कानून के हाथ उनके पिता तक भी पहुंच सकते हैं।

यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी इसे राजनीतिक प्रतिशोध का विषय बना रही है और सरकार आम चुनाव से पहले शिकंजा कस रही है। सीबीआई अदालत से टू-जी मामला खारिज कर दिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में उसके कुछ मामले चल रहे हैं और दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय मारीशस की कंपनियों से आईएनएक्स मीडिया में आए भारी निवेश पर भी नज़र गड़ाए हुए है। नब्बे और इस सदी के पहले दशक में मारीशस और मलेशिया के रास्तों से भारत में बहुत सारे निवेश हुए हैं।

सरकार ने इन देशों के साथ ऐसी संधियां कर रखी थीं, जिनके तहत इस रास्ते से आने वाली कंपनियां दोहरे कराधान से मुक्त रहती थीं। पहले की सरकारों ने उसे इसलिए नहीं छेड़ा कि उससे निवेश घटने और उदारीकरण के धीमा पड़ने का खतरा था। मौजूदा सरकार उन्हें चुनिंदा तरीके से इसलिए उठा रही है, क्योंकि इससे उसे राजनीतिक लाभ मिलेगा। इसलिए कानून की दृष्टि में पक्ष और विपक्ष भले बराबर होते हैं लेकिन, राजनीति की नज़र में ऐसा बिल्कुल नहीं होता।

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