Hindi News »Abhivyakti »Editorial» Bhaskar Editorial On Maharashtra Farmers March

राजनीति को परे रख किसानों की मांगों पर ध्यान दे सरकार

इस आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा के हाथ में है और वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी वाली शाखा है।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 13, 2018, 06:17 AM IST

राजनीति को परे रख किसानों की मांगों पर ध्यान दे सरकार

यह अच्छी बात है कि देश का ध्यान उन 40 हजार किसानों की ओर जा रहा है, जो नासिक से 160 किलोमीटर पैदल चलकर मुंबई पहुंचे हैं और सरकार से अपनी मांगों के लिए याचना कर रहे हैं। नासिक कृषि उत्पादों की बहुत बड़ी मंडी है और मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। अगर इसके बीच देश के किसान दुखी और नाराज हैं तो जरूर व्यवस्था में कहीं कुछ गड़बड़ है। पिछले साल मध्यप्रदेश में मंदसौर, रतलाम और इंदौर से लेकर भोपाल तक किसानों ने उग्र प्रदर्शन किया था। संयोग से उस आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ही एक किसान नेता कर रहे थे।

इस आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा के हाथ में है और वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी वाली शाखा है। इसके बावजूद उसे कांग्रेस, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिव सेना का समर्थन प्राप्त है। इस प्रदर्शन में वे आदिवासी भी हैं जो जंगल में मिली हुई जमीन को जोत रहे हैं लेकिन, वह अभी तक उनके नाम नहीं हुई है। ये लोग एक तरफ कर्ज माफी, दूसरी तरफ वन अधिकार अधिनियम के तहत अपने अधिकार और किसानों को उपज उचित का मूल्य दिलाने के लिए बनी स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को भी लागू करने की मांग कर रहे हैं।

स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पर बड़े -बड़े दावों के बावजूद सरकार ने न तो सी-2 फार्मूले को लागू करने की पहल की है और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य में अनाज की अधिकतम किस्मों को शामिल किया है। उल्टे जमीन का किराया न देने वाले ए-2 फार्मूले को लागू किया जा रहा है और वह मूल्य भी हकीकत में प्राप्त नहीं हो रहा है। किसानों की विडंबना यह है कि वह देश का अन्नदाता होने के बावजूद अपना पेट नहीं भर पाता। अगर उसका पेट भर भी जाता है तो शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी जरूरतें नहीं पूरी होतीं। यही वजह है कि वह आत्महत्या करने को मजबूर होता है।

आदिवासियों को जंगल में अधिकार दिलाने के लिए 2006 में वन अधिकार कानून बनने के बावजूद राजनेता, अधिकारी और ठेकेदार का त्रिकोण उसे लागू नहीं होने देते। यह बात सरकार द्वारा गठित वर्जीनिया खाखा कमेटी की रपट में स्पष्ट तौर पर कही गई है। इसीलिए जाति और धर्म के दायरे को तोड़कर किसान संगठित होकर सरकार के समक्ष शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने आए हैं और सरकार को राजनीतिक पक्षपात के बिना उन पर ध्यान देना चाहिए।

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Editorial

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×