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दावोस में कठिन प्रश्न उपस्थित करेगी कमाई की गैर-बराबरी

देश के अमीरों की आय में पिछले साल होने वाली बढ़ोतरी 20.9 लाख करोड़ रुपए है जो कि देश के सालाना बजट के बराबर है।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 23, 2018, 06:57 AM IST

दावोस में कठिन प्रश्न उपस्थित करेगी कमाई की गैर-बराबरी

विश्व आर्थिक मंच की सालाना दावोस बैठक से ठीक पहले आक्सफैम नामक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय संस्था ने अपने सर्वेक्षण में भारत में पिछले साल कमाई के दौरान उत्पन्न बेइंतहा गैर-बराबरी की चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत की है, जिसका प्रभाव वहां निवेश की बड़ी उम्मीद लेकर गए भारत के प्रधानमंत्री और उनके प्रभावशाली प्रतिनिधिमंडल पर पड़ सकता है।

आक्सफैम का सर्वेक्षण बताता है कि 2017 में होने वाली कमाई का 73 प्रतिशत धन देश के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के हाथ में केंद्रित हुआ है और देश की आधी आबादी यानी 67 करोड़ लोगों की कमाई में महज एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है। देश के अमीरों की आय में पिछले साल होने वाली बढ़ोतरी 20.9 लाख करोड़ रुपए है जो कि देश के सालाना बजट के बराबर है।

कमाई में होने वाली यह गैर-बराबरी इसलिए भी चौंकाती है, क्योंकि 2016 के मुकाबले इसमें बहुत अंतर आया है। उस साल देश के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल कमाई का 58 प्रतिशत हिस्सा गया था, जबकि वैश्विक अनुपात 50 प्रतिशत का था। दुनिया के दस देशों के 70,000 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण में इस साल का वैश्विक अनुपात 82 प्रतिशत का है जो और भी चिंता बढ़ाने वाला है।

बड़े लाव-लश्कर के साथ दावोस पहुंचे मोदी सरकार के लिए यह सर्वेक्षण कठिन प्रश्न खड़े करेगा, क्योंकि उस सम्मेलन में निवेश की उम्मीद होती है तो दुनिया में बढ़ती असमानता को मिटाने पर चर्चा भी होती है। भारत में बढ़ती असमानता के आंकड़ों पर तब से बहस छिड़ी हुई है जब से दुनिया के मशहूर अर्थशास्त्री और ‘कैपिटल इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी’ जैसी पुस्तक लिखने वाले थामस पिकेटी ने इस ओर ध्यान खींचा है।

अब आक्सफैम की ओर से आए उसी तरह के आंकड़ों पर देश में बहस तेज होगी। सामाजिक स्तर पर देश के विभिन्न तबकों में कभी आरक्षण, तो कभी स्वाभिमान के नाम पर फूटते असंतोष और बढ़ती हिंसा लोगों की बेचैनी के प्रमाण हैं।

मोदी सरकार के पास सिर्फ एक बजट पेश करने का अवसर है और इस असमानता को कम करने का कोई ठोस उपाय दिख नहीं रहा है। थामस पिकेटी और आक्सफैम ने असमानता की बढ़ती खाई को घटाने के लिए कॉर्पोरेट टैक्स बढ़ाने और कंपनियों के प्रमुखों के वेतन की सीमा तय करने का सुझाव दिया है। सवाल है कि क्या सरकार उस दिशा में कोई कदम उठा पाएगी?

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