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आखिरकार अपने जीवन पर अपनी मर्जी चलाने की मंजूरी

पांच जजों की पीठ ने चार अलग-अलग आदेश लिखे हैं लेकिन, उनका निष्कर्ष समान है।

Dainik Bhaskar

Mar 10, 2018, 05:29 AM IST

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने इच्छा मृत्यु के लिए दिशानिर्देश जारी करके उस स्थिति को स्पष्ट कर दिया है जो उसके निर्णय और सरकार के विधेयक के बीच फंसी हुई थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग बनाम भारत सरकार के मुकदमे में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सैद्धांतिक रूप से इजाजत देकर सरकार के समक्ष उसकी कार्यविधि निर्धारित करने का दायित्व डाल दिया था। इस बीच सरकार की तरफ से कोई पहल न होते देख कामनकॉज़ नामक गैर-सरकारी संस्था की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं।

इससे यह भ्रम दूर होता है कि असाध्य रूप से बीमार मरीज को जीवन प्रणाली पर न रखने या एंटीबायोटिक न दिए जाने का फैसला लेने का अधिकारी कौन है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि अब गंभीर रूप से बीमार कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए यह वसीयत बना सकता है कि उसे एक अवस्था के बाद दवाएं न दी जाएं या उसके शरीर को विशेष मशीन पर न रखा जाए। पांच जजों की पीठ ने चार अलग-अलग आदेश लिखे हैं लेकिन, उनका निष्कर्ष समान है।

इनमें न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा है कि जीवन और मृत्यु अविभाज्य हैं और जीवन प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है। ऐसे में मरना भी जीवन का ही हिस्सा है। मरीज के करीबी मित्र या रिश्तेदार द्वारा पेश की गई वसीयत के माध्यम से मेडिकल बोर्ड को कोई फैसला लेने में मदद मिलेगी और व्यक्ति अपने जीवन को पीड़ा से मुक्त कर सकेगा। न्यायालय ने इस प्रकार अपने सैद्धांतिक निर्णय को अमली जामा पहनाने का एक साहसिक कदम उठाया है, क्योंकि इस बारे में कार्यपालिका झिझक रही थी।

तमाम तरह के विवादों को जन्म देने वाली कार्यपालिका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के इस मसले पर फैसला लेने में क्यों झिझकती है यह समझ से परे है। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय दिशानिर्देश व्यक्तिगत आजादी को मजबूत करने वाला है। हालांकि, सरकार ने कहा है कि अब वह भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को अपराध के दायरे से मुक्त करने जा रही है। सरकार की यह मंशा व्यक्ति की उसी इच्छा को सशक्त करने वाली है, जिसके तहत वह इच्छामृत्यु का अधिकार प्राप्त करेगा। अब सरकार को बिना देरी के इस विषय में कानून बनाना चाहिए ताकि मेडिकल बोर्ड, न्यायालय और समाज को जीवन और मृत्यु के बारे में एक अहम फैसला लेने में कोई दुविधा न रहे।

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