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शीर्ष कोर्ट की दो पीठों में भूमि अधिग्रहण का मसला

न्यायिक विकास के दौरान पैदा हुई गतिरोध की स्थिति है और इससे निपटने के लिए बड़े न्यायिक विवेक की जरूरत है।

Bhaskar News | Last Modified - Feb 23, 2018, 11:29 PM IST

शीर्ष कोर्ट की दो पीठों में भूमि अधिग्रहण का मसला

सुप्रीम कोर्ट में तीन-तीन जजों की पीठ के आमने-सामने आने से इंसाफ अटक गया है। यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ और दीपक गुप्ता की पीठ ने उससे पहले आए न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, एके गोयल और मोहन एम शांतनागौडार के भूमि अधिग्रहण संबंधी फैसले को स्टे कर दिया था। अरुण मिश्रा की पीठ ने कहा था कि अगर पांच साल तक किसी को जमीन का मुआवजा नहीं दिया गया है तो उसे जमीन अधिग्रहण रद्‌द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इस पीठ ने यह निर्णय चार साल पहले दिए गए न्यायमूर्ति लोढ़ा के फैसले को पलटते हुए दिया था।

स्पष्ट तौर पर यह न्यायिक विकास के दौरान पैदा हुई गतिरोध की स्थिति है और इससे निपटने के लिए बड़े न्यायिक विवेक की जरूरत है। अब इस मामले को देखने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे और उसमें न्यायिक अनुशासन, न्यायिक औचित्य और नियमितता के सवालों पर विचार होगा। भूमि अधिग्रहण का सवाल भारतीय राजनीति को भी लंबे समय से मथता रहा है और जाहिर है वह न्यायपालिका को भी आसानी से छोड़ने वाला नहीं है। विकासमान भारतीय समाज एकतरफ तेजी से शहरीकरण और उद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है तो दूसरी ओर उसके भीतर किसानों के हकों की हिफाजत की आवाज भी उठ रही है।

इसी खींचतान के बीच 119 साल बाद 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में 2013 में बड़ा संशोधन किया गया और उसे किसान हितैषी बनाया गया। जाहिर है कि संसद की भावना किसानों और उस काश्तकार को संरक्षण देने की थी, जिनकी जमीन जाने से उसका भविष्य असुरक्षित होता है। औद्योगीकरण के पक्षधरों की आपत्ति रही है कि इससे विकास अवरुद्ध हो जाएगा और कारखाने लगाना या शहर बसाना मुश्किल हो जाएगा।

एनडीए सरकार इस कानून को कमजोर करने के लिए अध्यादेश लाने और संशोधन करने विफल प्रयास कर चुकी है। यही द्वंद्व न्यायपालिका का भी पीछा कर रहा है। अन्वय का न्यायिक विवेक कहता है कानून की व्याख्या में संसद की भावना का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट की दो पीठों में टकराव हुआ है तो कहीं उस भावना को समझने में कमी रही है। उम्मीद है कि संवैधानिक पीठ उसे समझेगी और मौजूदा न्यायालयीन गतिरोध को दूर करते हुए देश के हित में फैसला लेगी।

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