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सांप्रदायिक संघर्ष के दुष्चक्र में उलझता पश्चिम बंगाल

उनसे सबक लेते हुए चुस्त और निष्पक्ष प्रशासन के साथ प्रशिक्षित काडर तैयार करना चाहिए।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 31, 2018, 06:54 AM IST

रामनवमी के मौके पर आसनसोल में भड़के दंगों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वाममोर्चा के शासन में शांत रहने वाले पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेजी से हो रहा है और उसे रोक पाने में तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने को लाचार पा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि ममता बनर्जी हिंदू समुदाय की सुरक्षा नहीं कर पा रही हैं। यही कारण है कि आसनसोल और दुर्गापुर से हिंदू समुदाय के लोगों के घर छोड़कर भागने की खबरें आ रही हैं और वहां के भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो डीसीपी से लड़ते और उन्हें धमकाते हुए देखे जाते हैं। जबकि ममता बनर्जी इसे भाजपा की बड़ी साजिश मानती हैं और कहती हैं कि सोशल मीडिया पर कभी बांग्लादेश और कभी किसी और देश के वीडियो चलाकर लोगों को भड़काया जाता है।

ममता बनर्जी एक जुझारू नेता और कुशल रणनीतिकार हैं और उन्होंने कम्युनिस्टों के 34 साल के शासन को पहले भाजपा के साथ हाथ मिलाकर कमजोर किया तो बाद में माओवादियों का सहयोग लेकर उखाड़ फेंका। बदले दौर में ममता बनर्जी की मुठभेड़ कमजोर हो चुकी माकपा से नहीं उस भाजपा से है और जो काडर आधारित राष्ट्रीय पार्टी हो चुकी है। भाजपा विकास और धर्म दोनों के आधार पर राजनीति करती है और उसके साथ स्थानीय मुद्‌दों का समावेश करती है। उसके सामने 2019 का लक्ष्य है और वह उसके लिए आर्थिक रूप से पिछड़े पश्चिम बंगाल को कई तरीके से लुभाना चाहती है। इसलिए ममता को आर्थिक की बजाय भावनात्मक मुद्दों की राजनीति से मुकाबला करना है।

इस लड़ाई में देश के बाहर की शक्तियां भी उनके लिए सहायक होंगी और इसीलिए वे पूरे देश में भाजपा विरोधी मोर्चे की तलाश में भटक रही हैं। उन्होंने पिछले साल बशीरहाट-भादुरिया के दंगों के बाद यह संकल्प जताया था कि वे पूरे राज्य में शांति वाहिनी का निर्माण करेंगी पर दंगे बताते हैं कि वे वैसा कर नहीं पा रही हैं। वाममोर्चा से लड़ते हुए ममता को अगर यह बात समझ में आई हो कि उनके कार्यकाल में राज्य में दंगे क्यों नहीं होते थे तो उन्हें उनसे सबक लेते हुए चुस्त और निष्पक्ष प्रशासन के साथ प्रशिक्षित काडर तैयार करना चाहिए।

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