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जातिहीनता की राह में कानून के दुरुपयोग की चुनौती

इससे यह आशंका पैदा होती है कि राजनीतिक दुश्मनी के चलते किसी बेगुनाह को परेशान या ब्लैकमेल करने के लिए मुकदमे लगाए गए हों

Danik Bhaskar | Mar 23, 2018, 02:18 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 की धारा 18 के विरुद्ध जाते हुए अग्रिम जमानत को मंजूरी देकर और गिरफ्तारी से पहले उच्च अधिकारी या पुलिस प्रमुख की इजाजत को अनिवार्य करके राजनीतिक बहस की गुंजाइश पैदा की है। अदालत ने यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान की धर्मनिरपेक्ष और जातिविहीन समाज की भावना के अनुरूप किया है लेकिन, इस पर अनुसूचित जाति और जनजाति समाज प्रतिक्रिया जता सकता है।

न्यायालय ने कहा है कि इस कानून का दुरुपयोग बढ़ गया है और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इसके प्रमाण हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 15-16 प्रतिशत मामलों में तहकीकात के बाद बंद करने वाली रिपोर्ट लग जाती है और अदालत तक आए 75 प्रतिशत मामलों में अभियुक्त या तो बरी हो जाते हैं या मुकदमे वापस हो जाते हैं।

इससे यह आशंका पैदा होती है कि राजनीतिक दुश्मनी के चलते किसी बेगुनाह को परेशान या ब्लैकमेल करने के लिए मुकदमे लगाए गए हों। स्थिति इसके ठीक विपरीत भी हो सकती है। संभव है घटना होने के बावजूद दलित वर्ग को पुलिस, प्रशासन और समाज के प्रभुत्वशाली लोगों का समर्थन न मिलने के चलते मामले छूट जाते हों।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र में पिछले दिनों अत्याचार के ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां दमित वर्ग के विरुद्ध गंभीर अपराधों में शामिल लोग छूट गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन महान लक्ष्यों को आगे करके अधिनियम की धारा 18 को निष्प्रभावी किया है उन लक्ष्यों को कोई भी नागरिक कमतर करके नहीं आंक सकता। उसी के साथ यह सवाल भी है कि उन लक्ष्यों को प्राप्त करने का तरीका क्या है?

कठोर कानून समाज में अत्याचार के विरुद्ध एक डर तो पैदा करते हैं लेकिन, प्रेम और भाईचारा विकसित नहीं करते। उनका डर उन्हीं को रोक पाता है जो शरीफ होते हैं। सामंती अपराधियों को रोक पाना उस कानून के वश में भी नहीं होता। हालांकि, इस बीच ब्लैकमेल की घटनाएं भी होती हैं। ऐसे में जरूरी है कि समाज सुधार के उदात्त उद्‌देश्यों को मानने वाले लोग आगे आएं और भाईचारे की जमीन पर बराबरी और मानवीय गरिमा का भवन बनाएं।