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क्या जनहित की बजाय चुनाव जीतना लक्ष्य बन गया है?

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

Danik Bhaskar | Mar 13, 2018, 06:37 AM IST

हाल ही में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में हुए विधानसभा चुनावों में 70 फीसदी तक मतदान दर्ज हुआ। यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए अच्छे संकेत हैं लेकिन, वर्तमान में चुनाव की व्यापक अवधारणा को सीमित किया जा रहा है। यानी स्थानीय मुद्‌दों पर राष्ट्रीय मुद्‌दे हावी हो रहे हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्‌दों को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देना उचित है?


पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव के परिणाम के बाद आई रिपोर्टों में सिर्फ जीत से जुड़े मुद्‌दे छाए रहे, जबकि स्थानीय मुद्‌दे और राज्य हित के पहलु नदारद रहे। यानी आज चुनाव के आयाम और रूप दोनों बदलते जा रहे हैं। जैसा कि राजस्थान में उपचुनाव के नतीजे को कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा वहीं भाजपा भी पूर्वोत्तर में मिली जीत को 2019 के लोकसभा चुनाव से जोड़ कर देख रही है। अब मसला यह है कि क्या चुनाव ही हमारा साध्य बन चूका है? जबकि यह तो लोक कल्याण व जनहित को साधने का साधन है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि विगत वर्षो में चुनाव काफी सुर्खियां बटोरते रहे हैं लेकिन, ये सुर्खियां निरर्थक मुद्‌दों और विवादों को लेकर ज्यादा रहीं। कर्नाटक के आगामी चुनाव में फिर कई राष्ट्रीय मुद्‌दे हावी रहेंगे।


दरअसल, चुनाव में जीत के मायने बदल गए है और जिस राजनीतिक चेतना का उभार हमें लोगों के बीच देखने को मिलता है उसका स्थानीयकरण करने की जरूरत है ताकि स्थानीय मुद्‌दों को सुलझाकर राज्य हित, विकास और लोक कल्याण को केंद्र में लाया जा सके। यही चुनाव का मुख्य उद्‌देश्य है, जिसे हासिल करके ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।

जरूरत है चुनाव परिणामों के विश्लेषण में सामाजिक विषयों और स्थानीय मुद्‌दों को महत्व दिया जाए न कि राजनीतिक विचारधारा के आधार पर इसका विश्लेषण किया जाए। चुनाव के पहले और नतीजों के बाद चर्चा यह हो कि राज्य के सामने बरसों से ये मुद्‌दे हैं और हर दल यह बताएं कि वह उन्हें सुलझाने के लिए कौन-सा तरीका अपनाएगा।

अमरजीत कुमार, 29
रिसर्च स्कॉलर, समाजशास्त्र वीर कुंवरसिंह विश्वविद्यालय, बिहार
amarjeetkumar313@gmail.com