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मरने का अधिकार, मारने के हक में न बदल जाए

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

शशांक कुमार रजक| Last Modified - Mar 14, 2018, 01:59 AM IST

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शशांक कुमार रजक

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निष्क्रिय युथेनेसिया और लिविंग विल की अनुमति दे दी है। 2005 में पहली बार अदालत में ‘कामन काज़’ संगठन ने इसकी गुहार लगाई थी और 12 वर्ष बाद इसकी अनुमति मिली है।


यह फैसला उन लोगों को राहत देने में उपयोगी होगा, जो  बरसों से वेंटिलेटर पर ज़िंदा हैं और उन्हें अपने होने का अहसास तक नहीं है। ऐसा जीवन रोगी व उसके परिजनों के लिए यातना से कम नहीं होता। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को जीने का अधिकार है, जिसका मतलब सिर्फ जीवित रहना नहीं बल्कि सार्थक व गरिमापूर्वक जीवन जीना है और गरिमापूर्वक मरना भी इसी अधिकार का विशिष्ट अंग है। इस प्रकार कोर्ट के फैसले ने इस अधिकार को संपूर्ण रूप दिया है।


देश में  इच्छा-मृत्यु के लिए कोई कानून नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत संबंधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। हालांकि, दया मृत्यु नैतिक रूप से गलत है। मानव जीवन असाधारण सुरक्षा व संरक्षण का हकदार है। अत्याधुनिक मेडिकल टेक्नोलॉजी ने मानव जीवन और उसकी गुणवत्ता बढ़ाना संभव बनाया है। दर्द से राहत देने वाली देखभाल और पुनर्वास के केंद्र बेहतर विकल्प हो सकते हैं ताकि लाइलाज रोगों से पीड़ित व्यक्ति दर्दमुक्त बेहतर जीवन जी सके। फिर ‘स्लीपरी स्लोप इफेक्ट’ की बात है यानी विक्षिप्त या बच्चे अथवा कोमा में गए ऐसे रोगी जो अपनी आवाज नहीं उठा सकते, उन्हें इसका नुकसान हो सकता है। समाज के सबसे कमजोर तबकों की हेल्थ केयर में कमी व उन्हें शिकार बनाने का खतरा भी हो सकता है। आशंका है कि ‘मरने का अधिकार’ मारने का अधिकार न बन जाए। 


इस तरह फैसले के दुरुपयोग की कई आशंकाएं हैं, इसलिए कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड बनाने की बात कही है, जो किसी की इच्छा मृत्यु की याचिका पर गंभीरता से विचार करेगा। यदि एक मुक्कमल तंत्र स्थापित हो गया तो देश में बहुचर्चित अरुणा शानबाग जैसी लंबी अवधि की पीड़ा किसी रोगी को नहीं झेलनी होगी और हर नागरिक को सम्मान और गरिमा के साथ जीने व उतनी ही गरिमा के साथ मरने का हक भी होगा।

 

शशांक कुमार रजक, 23
आईआईटी खड़गपुर
facebook : shashank.rajak1

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