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अब पूर्वोत्तर के तीन राज्यों पर जमी है भाजपा की निगाहें

आमतौर पर कम चर्चित रहने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों के चुनाव इस बार ज्यादा चर्चित हो सकते हैं।

Editorial | Last Modified - Jan 19, 2018, 05:19 AM IST

आमतौर पर कम चर्चित रहने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों के चुनाव इस बार ज्यादा चर्चित हो सकते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक के चुनाव की पूर्वपीठिका के तौर पर फरवरी में होने जा रहे त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव भाजपा शासित राज्यों की गिनती बढ़ा भी सकते हैं या कांग्रेस का उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं। नगालैंड और मेघालय के चुनाव परिणाम सत्तारूढ़ दलों को सत्ता से हटाने वाले हो सकते हैं। जबकि त्रिपुरा में 1993 से सत्ता पर काबिज वाममोर्चा की सरकार की मजबूती अभी तक दिख रही है और 68 साल की उम्र के माणिक सरकार की कार्यकुशलता और ईमानदारी दूसरे नेताओं से अलग दिखती है। इन राज्यों की विधानसभाओं में साठ सीटें हैं और कई बार सरकार बनाने का फैसला एक दो विधायक ही करते हैं। पूर्वोत्तर के लिए खास नीति और योजना लेकर चल रही भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह वहां डेरा डाले हुए हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी रैलियां तय हो गई हैं। मेघालय में आठ साल से शासन कर रही कांग्रेस पार्टी में विद्रोह की स्थिति है और कई विधायक मुख्यमंत्री मुकुल संगमा का साथ छोड़ चुके हैं। जबकि एनसीपी वहां स्वतंत्र रूप से कम से कम चालीस उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी में है। नगालैंड में नगालैंड पीपुल्स फ्रंट भाजपा के सहारे सरकार चला रही है और भाजपा की कोशिश है कि वह और मजबूत होकर उभरे। नगालैंड की असली चुनौती उग्रवाद की है और मौजूदा सरकार उसी बिना पर चुनाव टालने की मांग भी कर रही थी। भाजपा और एनडीए सरकार का लक्ष्य पूर्वोत्तर के सभी राज्यों पर सत्ता में आने के साथ वहां अपनी नीतियों को समेकित तरीके से लागू करने का है और इस उद्‌देश्य को प्राप्त करने में वह पूरी ताकत झोंक रही है। कांग्रेस पार्टी के लिए एक के बाद एक ढहते हुए किले के बचाने की चुनौती है। पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवा चुके कम्युनिस्ट चाहेंगे कि माणिक सरकार की छवि के आधार पर त्रिपुरा को बचाया जाए। जबकि भाजपा ने त्रिपुरा के उन क्षेत्रों पर अपनी निगाह लगा रखी है जहां जीत कम वोटों से हुई थी। पूर्वोत्तर में विकास करने, आदिवासी समूहों को एकजुट करने और अलगाववाद को मिटाने की चुनौती बड़ी है। भाजपा और उसके संगठनों का मानना रहा है कि चर्च के प्रभाव में बहुत सारी समस्याएं पैदा हुई हैं और उसे घटाकर उनसे निपटा जा सकता है।
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