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नेताजी के तीन सिद्धांतों से होगा देश का उद्धार

सुभाषचंद्र बोस की 121वीं जयंती पर आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण की उनकी कल्पना

Dainik Bhaskar

Jan 20, 2018, 05:47 AM IST
चंद्र कुमार बोस, पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस, पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्ष

नेताजी सुभाषचंद्र बोस 18 अगस्त 1945 को गायब हो गए, मेरे जन्म के बहुत पहले। मेरे पिता अमीय नाथ बोस अपने चाचा नेताजी के बहुत निकट थे। 1928 से 1936 तक वे उनके साथ बेडरूम शेयर करते थे। फिर जेल में, विदेशों में और वुडबर्न पार्क के हमारे मकान की दूसरी मंजिल पर दोनों ने बहुत-सा वक्त साथ गुजारा। नेताजी को नींद नहीं आती थी। वे प्राय: रात साढ़े बारह-एक बजे तक लौटते। फिर नहाते और टेबल पर जो भी भोजन रखा होता उसे खाते। फिर वे मेरे पिताजी को जगाते और गांधी, नेहरू, पटेल सहित कई मुद्‌दों पर चर्चा करते। 1928 में जब कोलकाता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो वर्दीधारी वालंटियरों का एक दल बनाया गया और नेताजी को उसका प्रमुख बनाया गया। मैंने पिताजी से सुना जब सुभाष दूसरी मंजिल से पहली मंजिल पर आ रहे थे तो उनके पिताजी जानकी नाथ बोस ने ऐसा कुछ कहा जो मुझे भविष्यवाणी जैसा लगता है। उन्होंने कहा, ‘सुभाष, मुझे उम्मीद है कि तुम भारत के गैरीबाल्डी (जनरल, राजनेता और राष्ट्रवादी जिन्होंने इटली के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई) बनोगे।’


मुझे अपने दादाजी शरदचंद्र बोस को जानने का भी मौका नहीं मिला क्यों वे भी मेरे जन्म के पहले गुजर चुके थे। नेताजी की तरह उनके बड़े भाई शरदचंद्र बोस के बारे में भी मुझे पिताजी से ही पता चला। वे मुझे उनके राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारों के बारे में बताते। एक बात जो मैंने नेताजी के विचारों से सीखी कि एक बार उद्‌देश्य तय हो जाए तो फिर कभी कोई समझौता मत करो। कुछ भी हो जाए वह लक्ष्य हासिल करना ही है। दोनों भाई अखंड स्वतंत्र भारत चाहते थे। वे विभाजन के घोर विरोधी थे। वे मानते थे कि भारत को आज़ादी के लिए लड़ना होगा, यह समझौतों से हासिल नहीं होगी। नेताजी कहते थे, ‘देशवासियों को ताज़ा उर्जा से प्रेरित करने के लिए हमें उनके सामने स्वतंत्रता की अखंड छवि रखनी होगी। इतने बरसों से हमने उन्हें बताया कि स्वतंत्रता यानी राजनीतिक स्वतंत्रता। लेकिन आगे से हमें बताना होगा कि हम उन्हें सिर्फ राजनीतिक बंधन से आज़ाद नहीं करना चाहते बल्कि हर तरह के बंधनों से आज़ादी देना चाहते हैं। स्वतंत्रता की लड़ाई का लक्ष्य है राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दमन की दासता से आज़ादी। हमें स्वतंत्र व वर्गविहीन समाज बनाना होगा।’


आज देश के सामने इतिहास का सबसे बड़ा संकट है। आज़ादी के बाद से ही विभिन्न दलों ने सांप्रदायिक, क्षेत्रीय और जातिवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है, जो आज भारत के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गई हैं। आर्थिक क्षेत्र में कुछ ही लोगों के हाथों में आर्थिक सत्ता व संपदा सिमट गई है। असंतोषजनक आर्थिक विकास और बढ़ती विषमता के कारण देश में असंतोष खदबदा रहा है। अब वक्त आ गया है कि नेताजी के सिद्धांतों को अमल में लाकर देश को आधुनिक व प्रगतिशील राष्ट्र बनाएं। उनका पहला सिद्धांत था निखालिस और अत्यंत सक्रिय राष्ट्रवाद। यहां स्वामी विवेकानंद को उद्‌धृत करना होगा, ‘पहले देवता जिनकी हमें आराधना करनी चाहिए वे हैं देशवासी।’ नेताजी का दूसरा सिद्धांत था ऐसा समाजवाद जिसकी जड़ें भारत के विचार व संस्कृति में हो। 30 मार्च 1929 को रंगपुर राजनीतिक सम्मेलन में उन्होंने कहा था, ‘स्वामी विवेकानंद ने बंगाल के इतिहास को नया मोड़ दिया है। उन्होंने बार-बार कहा जीवन में उनका मिशन है व्यक्तियों का निर्माण। उन्होंने किसी पंथ तक अपने को सीमित नहीं रखा बल्कि पूरे भारतीय समाज को गले लगाया। इस समाज का संबंध कार्ल मार्क्स की किताबों से नहीं है। इसका संबंध भारतीय विचार व संस्कृति से है। हमें समाजवाद पश्चिम से आया विचार लगता है क्योंकि, हम अपने ही इतिहास से दूर हो गए हैं। यह ठीक नहीं है कि किसी विचार को पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि मार्क्स के मूल शिष्य रूसियों ने भी मार्क्सवाद को ज्यों का त्यों नहीं अपनाया। इसलिए भारत को अपना समाजवाद विकसित करना होगा।’


आधुनिक विश्व में किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता व सुरक्षा तब तक सुनिश्चित नहीं हो सकती जब तक कि वह सैन्य स्तर पर मजबूत राष्ट्र नहीं होता। इसलिए नेताजी का तीसरा सिद्धांत था देश में सैन्यवाद का विकास। नेताजी अर्जुन और महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं के प्रतीक थे। महात्मा गांधी अहिंसक संघर्ष में विश्वास करते थे और वे व्यापक जनमानत को इसके लिए एकजुट कर सके। यह उनकी उपलब्धि थी। नेताजी का मानना था कि सशस्त्र संघर्ष के बिना भारत एकजुट नहीं रह पाएगा और उसे मुकम्मल आज़ादी नहीं मिल पाएगी। स्वतंत्रता संघर्ष के जरिये आनी चाहिए। नेताजी अतिवादी नहीं, व्यावहारिक थे। अाज भारत को एशिया की उभरती महाशक्ति माना जा रहा है, चीन से ठीक पीछे। हाल के दिनों में इसने प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि हासिल की है। भारतीय सेना दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी सेना है। ऐसी सैन्य और सांस्कृतिक व कला के क्षेत्र का वैभव 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ और अन्य शहरों में झांकियों में प्रस्तुत होगा। कोलकाता में जब रेड रोड (नया नाम- इंदिरा गांधी सारानी) से गणतंत्र दिवस की भव्य परेड गुजरेगी तो एक भव्य प्रतिमा उसे निहारेगी, जो नेताजी सुभाषचंद्र बोस की है। 23 जनवरी को 2018 को उनकी 121वीं जयंती है। केंद्र सरकार के सामने प्रस्ताव है कि केंद्र सरकार नेताजी के जन्मदिवस को ‘राष्ट्रीय देशप्रेम दिवस’ घोषित किया जाए।


बेशक दुनिया की तरह भारत में भी हम सच्चे नेतृत्व के अभाव पर खेद जताते हैं। हमारे समाज सहित सभी समुदाय धर्म, जाति, नस्ल आदि भेदभाव से उत्पन्न झगड़ों से ग्रस्त हैं। साझे हित की कीमत पर स्वहित सर्वोपरि हो गया है। ऐसे ही उपद्रवी समय में सुभाषचंद्र बोस अपने योग्य नेतृत्व से स्री-पुरुषों को क्षुद्र मतभेदों से उबर कर आज़ादी के लिए लड़ने हेतु प्रेरित कर पाए थे। मैं युवाओं को संदेश देना चाहता हूं कि नेताजी को एक नेता के रूप में कौन-सी बात अनूठा बनाती थी? यह था धार्मिक प्रतीकों को राजनीतिक उद्‌देश्य से इस्तेमाल करने से उनका इनकार और यही कारण है कि सारे समुदायों में उनके प्रति जबर्दस्त आकर्षण था और है। हमें वह समाज बनाने के लिए खुद को फिर से समर्पित करना चाहिए जो नेताजी बनाना चाहते थे- ऐसा समाज जो हर तरह के बंधनों से मुक्त हो।


(लेखक सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई शरदचंद्र बोस के प्रपोत्र हैं।)

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चंद्र कुमार बोस, पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्षचंद्र कुमार बोस, पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्ष
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