--Advertisement--

तत्काल ‘स्वच्छ बैंक’ मिशन चलाने की जरूरत

संदर्भ: सार्वजनिक क्षेत्र में हमें इतने अधिक बैंक नहीं चाहिए वरना घोटालों की उतनी अधिक आशंका बनी रहेगी

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 05:17 AM IST
chetan bhagat article over bank loan fraud row

यह लेख लिखे जाने तक वाट्सएप वाले हर भारतीय के पास नीरव मोदी/पीएनबी पर कम से कम आधा दर्जन जोक्स आ चुके होंगे। यह कल्पना नहीं की जा सकती कि एलओयू जैसी तकनीकी शब्दावली वाला बैंकिंग घोटाला लोगों का ध्यान खींचेगा। लेकिन, नीरव मोदी कोई सामान्य घोटालेबाज नहीं हैं। एक, उनका खुद का बिज़नेस तुलनात्मक रूप से सरल-सा है और सारे भारतीयों से जुड़ता है- जुलरी। दो, उनके विज्ञापनों में बॉलीवुड के शीर्ष सितारे शामिल रहे हैं। इससे यह तो पक्का हो गया कि बहुत सारे लोगों ने उनके बारे में सुन रखा था। फिर चाहे वे उनका 30 लाख का ब्रेसलेट खरीदने की क्षमता न रखते हों। तीन, प्रधानमंत्री के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि नीरव का उपनाम मोदी है।


अपने अंकल मेहुल चौकसी के साथ नीरव उस गुजराती माफिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसकी इस सरकार पर पकड़ दिखती है, वे जो चाहे वह करके बच निकल सकते हैं। डेवोस में प्रधानमंत्री के साथ ग्रुप फोटो इस धारणा की पुष्टि करता है। यह सब देश की कल्पनाशक्ति को भड़काने के लिए काफी था। पीएनबी, वे लोग जिन्होंने गारंटी जारी की वे भ्रष्ट होने के साथ ऐसे लोगों के रूप में सामने आए, जिन्हें कुछ पता ही नहीं था। पीएनबी की जो छवि बनी हुई है उसमें ये लोग फिट भी बैठते हैं, जो सामान्य ग्राहक को तो भयावह सेवाएं देते हैं पर बड़े उद्योगपतियों को वे वह सब लूटने में मदद करेंगे, जो वे लूटना चाहते हैं।


इस बीच, नीरव अपने लग्ज़री होटल सुइट से सेंट्रल पार्क का व्यू ले रहे हैं। वे शायद न्यूयॉर्क में ब्राडवे शो के टिकट बुक करा रहे होंगे (वैसे बता दें कि ‘हैमिल्टन’ को वाकई अच्छा माना जा रहा है)। एक दशक से ज्यादा समय तक व्यक्तिगत रूप से बैंक में (उस बट्‌टे खाते सहित, जहां नीरव मोदी का लोन प्राय: पहुंचता है) काम करने के कारण मैं यह बता सकता हूं : नीरव मोदी की ओर से हुई गड़बड़ी को सिद्ध करना आसान नहीं होगा। वे (या उनके वकील, क्योंकि उन्हें तो अब शो देखना है) यह सीधी-सी दलील देंगे : ठीक है उस मूर्ख बैंक ने मुझे बिना किसी सिक्युरिटी या आधार के एलओयू अथवा गारंटी लेटर दे दिया। मैंने ले लिया। तो क्या हुआ? कोई आपके सामने अच्छी पेशकश रखे तो आप क्यों नहीं स्वीकार करेंगे? मैंने उस गारंटी का इस्तेमाल बहुत सारा पैसा जुटाने में किया, अपने नाम से स्टोर खोले और वे ब्रेसलेट बेचने की कोशिश की, जिनकी लागत किसी अपार्टमेंट की लागत से ज्यादा थी। लोगों ने उन्हें नहीं खरीदा। मैं फंस गया। सॉरी, डियर पीएनबी, मैंने आपसे गारंटी ली (और इसके लिए फीस भी चुकाई)। कृपया मेरे कर्जदारों को भुगतान कीजिए। मैं दिवालिया हो चुका हूं, बिज़नेस में एकदम मूर्ख साबित हुआ हूं लेकिन, मैं अपराधी नहीं हूं। मुझे शांति से कॉफी और बैगल (एक प्रकार की ब्रैड) लेने दीजिए।’


मुद्‌दा यह है कि यह मामला नीरव मोदी या पीएनबी या भाजपा अथवा कांग्रेस तक का नहीं है। समस्या व्यवस्थागत है और सब दूर फैली हुई है। पूरी व्यवस्था में ही खामी है। फिर एक बार पैसा चुकाया नहीं गया तो यह सिद्ध करना लगभग असंभव होता है कि यह धोखाधड़ी थी न कि गलत दिशा में गया ईमानदारी से किया जा रहा बिज़नेस। इसीलिए तो सार्वजनिक क्षेत्र के हमारे सारे बैंक (ऐसे कुल 21 हैं) रिसते नल की तरह हैं, जो पैसे को नाली में बहा रहे हैं। आप उनमें अपना पैसा दो तरह से रखते हैं। एक, सरकार नागरिकों पर अधिक कर लगाकर पूंजी वहां लगाती है। दो, नागरिक अपना पैसा वहां डिपॉजिट करते हैं। उसके बाद पीएनबी वाले तय करते हैं कि उस पैसे का क्या करना है और किसे लोन पर देना है। कुछ लोन तो जायज होते हैं यानी सही लोगों को, उचित आधार पर दिए जाते हैं।


हालांकि, रिपोर्टिंग प्रोसेस में इतनी खामियां हैं कि सिस्टम को चकमा दिया जा सकता है। मसलन, कोई यह पकड़ नहीं पाया कि नीरव मोदी को दी गई गारंटियों के पीछे कोई सिक्युरिटी नहीं है, कोई आधार नहीं है। इस घालमेल में कुछ भ्रष्ट कर्मचारी, इन बैंकों को वास्तव में नियंत्रित करने वाले नेता व लालची प्रमोटर और जोड़ दीजिए- तो वास्तव में कोई साजिश अंजाम देना उतना कठिन नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में बट्‌टे खाते का कर्ज निजी क्षेत्र के बैंकों से तीन गुना अधिक है, जो लाखों करोड़ों तक पहुंच गया है। आप कल्पना कर सकते हैं कि इन सरकारी बैंकों में कैसी अंधाधुंध पार्टी चल रही है। घोटालों के सामने आते रहने से यह साफ ही है।


समाधान सिर्फ नीरव का पीछा करना नहीं है। समाधान इन बैंकों की व्यवस्था को तत्काल सुधारने में है। हमें सार्वजनिक क्षेत्र में 21 बैंक नहीं चाहिए। ऐसे जितने अधिक बैंक होंगे, उतने अधिक लोगों के पास उनका प्रभार होगा और उनके भीतर छिपे तौर पर की जाने वाली गड़बड़ियों की आशंका भी उतनी ही अधिक होगी। हमें सार्वजनिक क्षेत्र के 3-5 बैंकों से अधिक की जरूरत नहीं है। शेष का एक-दूसरे में विलय कर देना चाहिए, उन्हें बेच देना चाहिए अथवा बंद तक कर देना चाहिए। बैंकों में ऐसा वर्ल्ड क्लास सिस्टम होना चाहिए, जो किसी भी ऐसे जोखिम (जिसमें बिना सिक्यूरिटी के दी गई गारंटी भी शामिल है) को पकड़ ले जो बैंक ने लिया है। जोखिम का पता रहने पर ऐसी गड़बड़ी होने के अवसर कम रहेंगे।


हमारे सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में सुधार पर दर्जनों रिपोर्टें मौजूद है, जरूरत है तो राजनीतिक इच्छा शक्ति और उन्हें ठीक करने की हिम्मत दिखाने की। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम करदाताओं का पैसा बर्बाद होता रहेगा। इससे भी बुरी बात तो यह है कि जो पैसा अर्थव्यवस्था के विकास में इस्तेमाल किया जा सकता है और जायज व्यवसायों में लगाया जा सकता है वह संदिग्ध प्रमोटरों की फंडिंग में लग जाएगा। सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय बैंक हमारी अर्थव्यवस्था को ठप कर रहे हैं, आपका पैसा बर्बाद कर रहे हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। हमें तत्काल इस सेक्टर की सफाई के लिए ‘स्वच्छ बैंक’ मिशन की जरूरत है। यह सिर्फ किसी अरबपति की बात नहीं है बल्कि एक अरब लोगों की बात है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

चेतन भगत
अंगरेजी के युवा उपन्यासकार
chetan.bhagat@gmail.com

X
chetan bhagat article over bank loan fraud row
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..