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भाजपा समर्थक सिर्फ करणी सेना वाले ही नहीं हैं

अदालतों ने भी इसे समर्थन दिया। लेकिन, मुड़कर देखने पर लगता है कि इसे बेहतर ढंग से संभाला जा सकता था।

चेतन भगत | Last Modified - Feb 08, 2018, 06:39 AM IST

भाजपा समर्थक सिर्फ करणी सेना वाले ही नहीं हैं

भाजपा का वोट आधार एक अनूठा कॉकटेल है। वे सभी दक्षिणपंथी हैं लेकिन, इस मामले में डिग्री यानी स्तर अलग-अलग है। फिर भी तीन मुख्य प्रकार है। पहला प्रकार है धुर दक्षिणपंथियों का। यह सबसे कट्‌टर ‘हिंदूज आर द बेस्ट, स्क्रू द रेस्ट’ (यानी हिंदू सर्वेश्रेष्ठ हैं, शेष को धमकाओ) श्रेणी के हैं। इसमें करणी सेना टाइप जैसे गुट आते हैं। ये वोटर चुपके से यह कह सकते हैं, मोदी ही मुस्लिम पर लगाम लगा सकते हैं या महिलाओं को सिर से पैर तक पूरी तरह ढंका होना चाहिए। कुछ लोग इन मतदाताओं को ‘द फ्रिंज’ यानी हाशिये के समूह कहते हैं। इस भ्रम में मत आइए यह फ्रिंज असल में भाजपा के समर्थन आधार का ठोस हिस्सा है। निश्चित ही थोड़े ही लोग वास्तव में हिंसा करते हैं या सार्वजनिक रूप से सिरफिरे बयान देते हैं लेकिन, अपने मन में सिर हिलाने वाले और उन्हें ‘सही बात है’ कहने वाले दसियों लाख लोग हैं। यह अद्‌भुत किस्म का मतदाता समूह है। ये लोग ज्यादा सोचते नहीं हैं। एक बार मतदाता भावनाओं में बहने लगे तो उनका मनमर्जी से इस्तेमाल किया जा सकता है। वे झुंड में आते हैं, राम का नाम लेते हैं और कमल का बटन दबा देते हैं। भाजपा उन्हें झपट लेती है। यदि आप भाजपा को चलाते होते तो क्या उन्हें नकार सकते थे?

भाजपा मतदाताओं का दूसरा वर्ग है हल्के दक्षिणपंथियों का या महत्वाकांक्षी भारतीय वोटरों का। ये शिक्षित लोग हैं, जिन्हें नौकरी चाहिए, जीडीपी वृद्धि, आर्थिक गतिविधियां और अवसर चाहिए। उन्हें ऐसी सरकार चाहिए, जो उन्हें यह सब दे सके। उन्हें स्वतंत्रता जैसे आधुनिक मूल्य भी चाहिए- डेटिंग, ड्रिंक, जिससे चाहे उससे विवाह करने की स्वतंत्रता चाहिए। वे ऐसा भारत चाहते हैं, जिस पर वे गर्व कर सकें। हालांकि, किसी और चीज की बजाय उन्हें जेब में ज्यादा पैसा चाहिए। ये वास्तव में आर्थिक दक्षिणपंथी मतदाता हैं। ये कॉलेज के विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील और नि:संदेह उन्हें मत भूलिए खास ‘प्रोग्रामर टाइप’ के लोग होते हैं। कोडिंग करने वाले लोग जो अपने अमेरिकी मित्रों को कहना चाहते हैं कि भारत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।


तीसरी श्रेणी है मध्यमार्गी दक्षिणपंथियों की, जो बीच में कहीं स्थित हैं। उन्हें किसी प्रकार के हिंदू हक में भरोसा है, क्योंकि वही हमारी आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा है। लेकिन, वे इसे लेकर हिंसक नहीं होंगे। वे भी आर्थिक वृद्धि चाहते हैं, हालांकि वे स्वतंत्रता के उन पहलुओं के बारे में कुछ निश्चित नहीं हैं, जो युवा, शिक्षित भारतीय चाहते हैं। ये छोटे और मध्यम व्यवसायी और सरकारी कर्मचारी हैं। कई आरएसएस वाले ‘संघी’ इस श्रेणी में आते हैं। यह वर्ग बहुत कुछ निष्क्रिय है, अत्यधिक वफादार और भाजपा के समर्थन आधार का सबसे बड़ा हिस्सा है।


मुद्‌दा यह है। भाजपा को चुनाव जीतने के लिए तीनों चाहिए धुर दक्षिणपंथी, हल्के दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी। एक भी वर्ग खिसक जाए तो भाजपा हार जाती है। आडवाणी के समय में धुर दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी पूरी तरह भाजपा के साथ थे। उनके पास हल्के दक्षिणपंथी नहीं थे। इसलिए भाजपा हार गई। किंतु 2014 में भाजपा ने इन तीनों वर्गों को जोड़ने वाला मुकम्मल आकर्षण खोज लिया- मोदी।
करणी सेना से आरएसएस अंकल और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर टाइप तक सबको हिंदू पुनरुत्थान का विचार पसंद है, जिसका नई सत्ता वादा करती है। ज्यादातर समय ये तीनों वर्ग ही शांति से रहते हैं। कभी-कभी वे कुछ चीजें चाहते हैं तो दूसरा वर्ग नहीं चाहता पर उससे कोई दिक्कत नहीं पैदा होती। सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर टाइप मोदी को दावोस में देखना पसंद करेंगे। इसका करणी सेना के लिए कोई महत्व नहीं है। इसी तरह धुर दक्षिणपंथी अयोध्या में मंदिर चाहेंगे। हल्के दक्षिणपंथियों को इसकी कोई परवाह नहीं है। हालांकि, परेशानी तब पैदा होती है जब इन वर्गों के एजेंडे टकराते हैं खासतौर पर धुर व हल्के दक्षिणपंथियों के बीच। तब भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द पैदा हो जाता है। हाल के पद्‌‌मावत ड्रामा में यही हुआ। करणी सेना ने मूवी का विरोध किया। भाजपा अपने धुर दक्षिणपंथी आधार को नाराज नहीं करना चाहती थी तो दूसरी तरफ देखने लगी। लेकिन, करणी सेना तोड़फोड़ पर उतारू हो गई। उन्होंने तो बच्चों से भरी बस में भी खौफ पैदा कर दिया। यहीं पर हल्के दक्षिणपंथी घबराने लगते हैं (जैसे कोई भी समझदार व्यक्ति घबराएगा)। क्योंकि सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर चाहे हिंदू गौरव चाहते हों पर वे यह नहीं चाहेंगे कि कोई हिंसक भीड़ उनके बच्चों को डराए। जब ये धुर दक्षिणपंथियों को बेकाबू होते और भाजपा को कुछ नहीं करते हुए देखते हैं तो हताश हो जाते हैं। घबरा जाते हैं। भाजपा के लिए यह चिंताजनक है। पार्टी वह नहीं देखना चाहेगी, जो इसने आडवाणी के नेतृत्व में देखा था। उसे धुर दक्षिणपंथी चाहिए पर हल्के दक्षिणपंथी भी चाहिए।


तो पार्टी क्या करे? इसे तो हमेशा ही तनी हुई रस्सी पर चलने की कवायद करना है। लेकिन, पद्मावत के मामले में ऐसा लगता है उसने करणी सेना को जरूरत से ज्यादा ढील दे दी। नैतिकता व कानूनी दृष्टिकोण से करणी सेना को बहुत पहले ही कुचल दिया जाना था। राजनीतिक दृष्टिकोण से भी भाजपा बहुत बड़ी गलती करने के खतरनाक रूप से नज़दीक पहुंच गई थी। यदि भीड़ और विध्वंस लाती जैसे हिंसा के कारण कुछ लोगों की मौत हो जाती अथवा इससे जुड़े किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता तो स्थिति नियंत्रण से बाहर भी हो सकती थी। भाजपा को अधिक तेजी से कार्रवाई करनी थी। उसे समझना चाहिए कि ‘फ्रिंज’ की कौन-सी गतिविधि सिर्फ खोखला शोर है और कौन-सी हरकत राष्ट्रीय स्तर के दावानल में बदल सकती है। भाजपा ने आखिरकार कार्रवाई की। सेन्सर बोर्ड ने फिल्म को हरी झंडी दिखाई। अदालतों ने भी इसे समर्थन दिया। लेकिन, मुड़कर देखने पर लगता है कि इसे बेहतर ढंग से संभाला जा सकता था।


भाजपा के तीन आधार बहुत कुछ साबूत हैं। हालांकि, हल्के दक्षिणपंथी हताश हैं। भाजपा को चाहिए कि वह युद्धस्तर पर ‘फ्रिंज’ को काबू करे। ये न सिर्फ भारत को असुरक्षित जगह बनाते हैं बल्कि भाजपा की नींव भी हिला देते हैं। भाजपा याद रखे कि उनका आधार सिर्फ करणी सेना नहीं है। सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर भी हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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Web Title: bhaajpaa smrthk sirf karni senaa vaale hi nahi hain
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